क्या आप जानते हैं, आप बंधन में क्यों हैं? | अष्टावक्र गीता — एपिसोड 19
BodhAdvaitAP
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क्या आप जानते हैं, आप बंधन में क्यों हैं? | अष्टावक्र गीता — एपिसोड 19
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क्या आप जानते हैं कि आप बंधन में क्यों हैं—और क्या जिस संसार से हम सुख की उम्मीद करते हैं, वही हमें मुक्ति दे सकता है?
अष्टावक्र गीता के इस एपिसोड में हम समझेंगे कि आत्मज्ञान के बाद भी मन संसार से लाभ, सुख और संतुष्टि क्यों खोजता है। होली के रंग और नशे के उदाहरण के माध्यम से जानेंगे कि अपनी बेचैनी का समाधान उसी जगह क्यों नहीं मिलता, जहाँ से वह पैदा हुई है। साथ ही, अर्थ शब्द के दो संकेतों—लाभ और मतलब—पर भी बात करेंगे।
आज का श्लोक
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥
सरल हिंदी अर्थ
अविनाशी और अद्वैत आत्मा को यथार्थ रूप से जान लेने के बाद भी, हे आत्मज्ञानी और धीर पुरुष, संसार से लाभ कमाने या पाने में तुम्हारी रुचि क्यों बनी हुई है?
यह श्लोक हमें अपनी इच्छाओं और उम्मीदों को देखने का निमंत्रण देता है: क्या हम संसार से वही माँग रहे हैं जो संसार दे ही नहीं सकता?
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