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मेघ आए ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ) / Megh Aaye ( Sarveshwar Dayal Saksena )

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मेघ आए ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ) / Megh Aaye ( Sarveshwar Dayal Saksena )

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मेघ आए" सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है। इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के आगमन की तुलना किसी शहर से गाँव आए 'दामाद' (पाहुन) से की है। कविता का संक्षिप्त सारांश: मानवीकरण: कवि ने बादलों का मानवीकरण किया है। जिस तरह दामाद के आने पर गाँव में उत्साह और हलचल मच जाती है, वैसे ही बादलों के आने पर प्रकृति में बदलाव आता है। प्रकृति का दृश्य: बादलों के आगे-आगे नाचती-गाती हवा (बयार) चलती है। लोग खिड़की-दरवाजे खोलने लगते हैं। ग्रामीण परिवेश: पेड़ गर्दन उचकाकर देखने लगते हैं, धूल घाघरा उठाकर भागती है और बूढ़ा पीपल झुककर बादलों का स्वागत करता है। मिलन का क्षण: अंत में, तालाब (जो सेवक के रूप में दिखाया गया है) पानी भरकर लाता है, और बिजली चमकने के साथ ही वर्षा शुरू हो जाती है, जिसे प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के आँसुओं के रूप में दर्शाया गया है।