आयुष्य कर्म का बंध: कब और कैसे होता है? | जैन धर्म
JAIN SUTRA
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आयुष्य कर्म का बंध: कब और कैसे होता है? | जैन धर्म
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जय जिनेंद्र! 🙏
आज के इस पावन स्वाध्याय में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
हमारे जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत का अत्यंत सूक्ष्म और गंभीर विवेचन प्राप्त होता है। आज के इस स्वाध्याय में हम 'आयुष्य कर्म' के स्वरूप, उसकी ४ प्रयुक्तियों (नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव आयुष्य), चार गतियों के मुख्य कारणों और आयुष्य कर्म के बंध के नियमों पर विस्तार से विचार करेंगे।
📌 स्वाध्याय के मुख्य बिंदु:
• आयुष्य कर्म क्या है? (बेड़ियों और कारागार का दृष्टांत)
• आयुष्य कर्म का प्रभाव और उसके क्षय से प्रकट होने वाला अवगाहनात्व गुण
• नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव गति के ४-४ कारण
• आयुष्य कर्म का बंध कब और कैसे होता है?
महानुभावों, यदि आपको जैन दर्शन के सिद्धांतों पर आधारित यह स्वाध्याय ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी लगा हो, तो कृपया इस प्रस्तुति को लाइक (Like) करें, अपनों के साथ शेयर (Share) करें, और चैनल को सब्सक्राइब (Subscribe) व फॉलो (Follow) अवश्य करें।
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