अढैय्या एकादशी के दिन भोजन जंगल में बनाता और उसका भोजन ठाकुर जी खा लेते || Moral Story ||hindistory
Ishu ki bhajan
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अढैय्या एकादशी के दिन भोजन जंगल में बनाता और उसका भोजन ठाकुर जी खा लेते || Moral Story ||hindistory
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अढैय्या एकादशी के दिन भोजन जंगल में बनाता और उसका भोजन ठाकुर जी खा लेते हैं इस लिए गुस्सा हो गया 😊 Moral stories।। #hindistories HASHTAGS:
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एकादशी का पावन दिन था। अढ़ैया ब्राह्मण फिर से आश्रम से दूर जंगल की ओर अपनी रसोई बनाने निकल पड़ा। आश्रम में उपवास का नियम था, लेकिन अढ़ैया के लिए बिना भोजन किए रहना किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं था। 😄
अढ़ैया भोला था, लेकिन उसके मन में अपने ठाकुर के प्रति बहुत गहरा प्रेम था। वह भगवान को किसी दूर बैठे देवता की तरह नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के सदस्य की तरह मानता था। इसी सरल भाव से वह अपनी बनाई हुई रसोई के सामने बैठकर ठाकुर जी को भोजन के लिए बुलाता था।
लेकिन उस दिन अढ़ैया के साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसकी पुकार सुनकर एक ऐसा मेहमान उसके सामने आ गया, जिसे देखकर अढ़ैया की आंखें खुली की खुली रह गईं। 😱🙏
इसके बाद हर एकादशी अढ़ैया की रसोई में एक नई लीला होने लगी। अढ़ैया की शिकायतें बढ़ती गईं और उसके गुरुजी को लगने लगा कि यह बालक शायद कोई विचित्र बात कर रहा है।
लेकिन अढ़ैया बार-बार एक ही बात कहता रहा—
वह झूठ नहीं बोल रहा है।
यह कहानी अढ़ैया की है जिसकी एक ही समस्या थी वह ढ़ाई किलो की बाटी अकेले खाता था, जिससे उसे कोई खाना भी नही देता था, क्योंकि उसकी खुराक़ ज्यादा थी, एक बार एक संत महात्मा की नजर पडी वह उसे अपने आश्रम ले गए, और बढ़िया वहा रहने लगा, उस आश्रम का एक नियम था, एकादशी को आश्रम मे रसोई नही बनती थी, गुरूदेव ने अढ़ैया से कहा, एकादशी के दिन उपवास रहता है, अढ़ैया ने उपवास करने से साफ मना कर दिया, भाटी तो चाहिए ही, वो भी ढाई किलो, फिर गुरूदेव ने कहा की ठीक है आश्रम मे रसोई मत बनाना जंगल मे जाकर पा लेना, पाने से पहले ठाकुर जी को भोग लगा देना, यही एक शब्द था, जिसने अढ़ैया की जिंदगी बदल थी, और उसने त्रिलोक के स्वामी और महादेव जी, हनुमान जी सहित सभी भगवान के दर्शन कर लिया, बहुत ही मजेदार कहानी है जरूर देखना,
इस कहानी से मिलने वाली सीखें:
सच्ची और सरल भक्ति में कोई औपचारिकता नहीं चाहिए — भगवान भाव के भूखे हैं, दिखावे के नहीं।
अज्ञानता में की गई भूल भी अगर सच्चे मन से हो, तो भगवान क्षमाशील होकर स्वीकार करते हैं।
भगवान अपने भक्तों की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते, चाहे पुकारने का तरीका कैसा भी हो।
अहंकार और गुस्सा अस्थायी है, पर सच्ची भक्ति की जीत निश्चित है।
ईश्वर स्वयं अपने भक्त की सेवा करने में संकोच नहीं करते।
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अढ़ैया भोला था, लेकिन उसके मन में अपने ठाकुर के प्रति बहुत गहरा प्रेम था। वह भगवान को किसी दूर बैठे देवता की तरह नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के सदस्य की तरह मानता था। इसी सरल भाव से वह अपनी बनाई हुई रसोई के सामने बैठकर ठाकुर जी को भोजन के लिए बुलाता था।
लेकिन उस दिन अढ़ैया के साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसकी पुकार सुनकर एक ऐसा मेहमान उसके सामने आ गया, जिसे देखकर अढ़ैया की आंखें खुली की खुली रह गईं। 😱🙏
इसके बाद हर एकादशी अढ़ैया की रसोई में एक नई लीला होने लगी। अढ़ैया की शिकायतें बढ़ती गईं और उसके गुरुजी को लगने लगा कि यह बालक शायद कोई विचित्र बात कर रहा है।
लेकिन अढ़ैया बार-बार एक ही बात कहता रहा—
वह झूठ नहीं बोल रहा है।