जब ज़िद पर आ गईं पार्वती...पार्वतीका कठोर तपस्या
DHARMA DARSHAN by khagendra Pd Bhurtel
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जब ज़िद पर आ गईं पार्वती...पार्वतीका कठोर तपस्या
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जब ज़िद पर आ गईं पार्वती...
पार्वती... पार्वती...
समझाने पहुँचे सप्तऋषि...
सप्तऋषि... सप्तऋषि...
लेकिन... क्या सप्तऋषियों के तर्क, पार्वती के अटल संकल्प को बदल पाए?
ब्रह्माजी के वरदान के कारण तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव था।
लेकिन सती देवी के देहत्याग के बाद, भगवान शिव संसार से विरक्त होकर गहन समाधि और योग में लीन थे।
देवताओं के सामने अब एक ही आशा थी...
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह।
देवर्षि नारद ने पार्वती को भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने की प्रेरणा दी।
पार्वती ने नारद के वचन को स्वीकार किया और अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया...
भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना।
पार्वती की कठोर तपस्या से भगवान शिव भी प्रभावित हुए। लेकिन वे यह जानना चाहते थे कि पार्वती का यह संकल्प केवल भावनात्मक आकर्षण है... या वास्तव में अटल श्रद्धा और दृढ़ निश्चय।
इसीलिए भगवान शिव ने वसिष्ठ आदि सप्तऋषियों को स्मरण किया।
सप्तऋषि तत्काल भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए।
भगवान शिव ने उनसे कहा—
“आप लोग पार्वती के पास जाओ और उनके संकल्प की परीक्षा लो। उनसे ऐसी बातें कहना, जिनसे उनके मन में शिव के प्रति संदेह उत्पन्न हो। देखना... क्या कठिन परिस्थितियों में भी उनका निश्चय अटल रहता है?”
सप्तऋषि पार्वती के पास पहुँचे।
उन्होंने तपस्या में लीन पार्वती को देखा और पूछा—
“हे शैलपुत्री! आप इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो? किसे पति रूप में प्राप्त करना चाहती हो?”
पार्वती ने शांत और स्पष्ट स्वर में उत्तर दिया—
“देवर्षि नारद के निर्देश से मैं यह तपस्या कर रही हूँ। मेरा एकमात्र मनोरथ है... कि भगवान रुद्र मेरे पति बनें।”
अब सप्तऋषियों ने पार्वतिका परीक्षा आरम्भ की।
उन्होंने सबसे पहले नारद के उपदेश पर प्रश्न उठाया।
उन्होंने कहा—
“नारद लोगों को वैराग्य का उपदेश देते हैं और उन्हें संसार तथा गृहस्थ जीवन से दूर कर देते हैं। दक्ष के पुत्रों ने भी उनके उपदेश से अपना सांसारिक कर्तव्य छोड़ दिया था। इसलिए आपको नारद के कहने पर इतना कठिन तप करने से पहले पुनः विचार करना चाहिए।”
लेकिन पार्वती शांत रहीं।
तब सप्तऋषियों ने भगवान शिव के स्वरूप को लेकर और भी कठोर तर्क प्रस्तुत किए।
उन्होंने कहा—
“जिस शिव को पाने के लिए आप इतना कठिन तप कर रही हो, उनके जीवन को देखो।
वे भस्म धारण करते हैं।
गृहहीन हैं।
संसार से विरक्त हैं।
प्रेत और भूतों के साथ रहते हैं।
नागों को आभूषण की तरह धारण करते हैं।
और हाथ में त्रिशूल रखते हैं।
वे सामान्य गृहस्थ जीवन से पूरी तरह अलग हैं।”
इसके बाद सप्तऋषियों ने एक दूसरा विकल्प सामने रखा।
उन्होंने कहा—
“भगवान विष्णु आपके लिए अधिक उपयुक्त वर हैं। वे सर्वगुणसम्पन्न हैं। वैकुण्ठ में निवास करते हैं। लक्ष्मीपति हैं और दिव्य ऐश्वर्य से युक्त हैं।
यदि आप चाहो... तो हम आपका विवाह भगवान विष्णु से करा सकते हैं।
इसलिए शिव को पाने का यह हठ छोड़ दीजिए... और सुखी हो जाइए।”
लेकिन...
पार्वती अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुईं।
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—
“मेरे लिए भगवान शिव केवल एक वर नहीं हैं। वे मेरे आराध्य हैं।
मैंने उन्हें ही अपने पति के रूप में स्वीकार किया है।
यदि भगवान शिव मुझे स्वीकार करेंगे... तो मैं उन्हीं से विवाह करूँगी।
और यदि वे मुझे स्वीकार नहीं करेंगे... तो मैं जीवनभर अविवाहित रहूँगी।
किसी अन्य पुरुष को पति रूप में स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
फिर पार्वती ने अपने संकल्प की अटलता को अद्भुत शब्दों में व्यक्त किया—
“यदि सूर्य पश्चिम दिशा में उदित होने लगे...
यदि मेरु पर्वत अपनी स्थिरता छोड़कर चलने लगे...
यदि अग्नि शीतल हो जाए...
और यदि पत्थर की शिला पर कमल खिल उठे...
तब भी मेरा यह निश्चय नहीं बदलेगा।”
अब सप्तऋषियों को सब कुछ स्पष्ट हो गया।
उन्होंने समझ लिया कि पार्वती की तपस्या किसी क्षणिक भावना का परिणाम नहीं है।
पार्वती का प्रेम केवल आकर्षण नहीं था।
वह था... अटूट विश्वास।
वह था... अटल संकल्प।
और वह था... भगवान शिव के प्रति पूर्ण समर्पण।
सप्तऋषियों ने पार्वती की दृढ़ता को समझ लिया।
उन्होंने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया और भगवान शिव के पास लौट गए।
और यहीं से आगे बढ़ती है...
भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह की कथा।
हर हर महादेव!
जय माता पार्वती!