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जय नागराजा महाराज कंण्डारगांव, भागीरथी रिकोर्डिंग स्टूडियो फौजी दिदा रामसिंह राणा

bhagirathi recording studio

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जय नागराजा महाराज कंण्डारगांव, भागीरथी रिकोर्डिंग स्टूडियो फौजी दिदा रामसिंह राणा

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भागीरथी रिकोर्डिंग स्टूडियो की प्रस्तुति स्वर: फौजी दिदा रामसिंह राणा रचना: फौजी दिदा संगीत: फौजी दिदा सहयोग:दिवान सिंह पडियार नागराजा उपासक: दिवान सिंह पडियार संयोजक: जूरा सिंह पडियार,उमेद सिंह पडियार, राजपाल सिंह पडियार,पवन सिंह पडियार,एवं समस्त ग्राम कंण्डारगांव। डोली निर्माता:विकाश पडियार, आदित्य कैन्तुरा कैमरा: फौजी दिदा निर्माता : रूद्राक्ष राणा ******************************************************************************************** जय श्री सेम नागराजा महाराज! गढ़वाल की पावन भूमि में भगवान सेम नागराजा महाराज को भगवान श्रीकृष्ण का नागराजा स्वरूप माना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि सेम नागराजा महाराज भगवान श्रीकृष्ण के ही दिव्य स्वरूप हैं। रमोली क्षेत्र में उनकी पूजा-अर्चना गहरी श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाती है। उनका नाम लेते ही भक्तों के मन में आस्था, शक्ति, न्याय और लोककल्याण की भावना जागृत होती है। भगवान सेम नागराजा महाराज रमोली कैसे और कब आए? स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना नदी में कालिया नाग का उद्धार किया, तब कालिया नाग ने भगवान से अपने रहने के लिए एक पवित्र स्थान मांगा। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे उत्तराखंड की हिमालयी भूमि में स्थित सेम मुखेम का रमणीक वन क्षेत्र बताया और वहां आने का आश्वासन दिया। लोककथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण जब रमोली क्षेत्र में पहुंचे, उस समय वहां वीरभड़ गंगू रमोला का शासन था। भगवान ने गंगू रमोला से रहने के लिए थोड़ी-सी भूमि मांगी, लेकिन गंगू रमोला ने पहले भूमि देने से इनकार कर दिया। इसके बाद भगवान ने अपनी दिव्य लीला दिखाई। मान्यता है कि गंगू रमोला को भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए और दो पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। इसके बाद गंगू रमोला ने भगवान को भूमि प्रदान की। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पवित्र भूमि पर अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया। तभी से इस स्थान पर भगवान सेम नागराजा की पूजा-अर्चना होने की मान्यता चली आ रही है। मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिला को द्वापर युग से संबंधित माना जाता है। धार्मिक लोकमान्यता के अनुसार भगवान सेम नागराजा महाराज का आगमन द्वापर युग में हुआ माना जाता है। हालांकि उनके आगमन की कोई प्रमाणित ऐतिहासिक तारीख या ईस्वी सन उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग लोककथाओं में घटनाक्रम के वर्णन में कुछ अंतर भी मिलता है।