मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला: तन्हाई और दर्द भरी ग़ज़ल
Moner Dastaan
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मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला: तन्हाई और दर्द भरी ग़ज़ल
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मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला: यह दर्द भरी ग़ज़ल आपकी तन्हाई और अकेलेपन के हर अहसास को शब्दों में पिरोती है। जगजीत सिंह स्टाइल की यह रूहानी प्रस्तुति उन लोगों के लिए है जो ज़िंदगी के सफ़र में खुद को तलाश रहे हैं।
जिंदगी के लंबे रास्ते पर मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला, बस एक खामोश सफर और टूटे हुए ख्वाब बाकी रह गए हैं। इस वीडियो में हमने तन्हाई और बेबसी के उस दर्द को संजोया है जो हर मुसाफ़िर कभी न कभी महसूस करता है। यह ग़ज़ल ज़िंदगी की उन अनकही दास्तानों को बयां करती है जहाँ सबको अपना बनाने की चाहत में इंसान खुद से ही बिछड़ जाता है।
⏱ Chapters
0:00 किससे कहूँ कहाँ जाना है (शायरी एवं भूमिका)
0:47 मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला (मुखड़ा)
1:25 ओ रे मुसाफ़िर कहाँ जाएगा
1:47 सारी दुनिया को ढूँढा मगर खुद का पता ना मिला
2:19 कभी धूप ने मेरा साया छीना (अंतरा 1)
2:58 हर शहर में अजनबी सा रहा
3:28 मंज़िल मिली ना हमसफ़र मिला (Chorus Repeat)
4:13 दिन ख्वाब देकर चला गया, रात हिसाब लेकर आ गई (शायरी)
4:47 अब ना किसी मंज़िल की चाहत (अंतरा 2)
5:26 सबको अपना बनाने में खुद से मिलने का वक्त ना मिला
5:56 ओ रे मुसाफ़िर ज़रा ठहर जा (चरम सीमा)
6:32 उम्र भर बस सफ़र ही मिला (समापन)
इस ग़ज़ल की कौन सी पंक्ति आपके दिल के सबसे करीब है? कमेंट में ज़रूर बताएं।
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