Kiske Liye Jee Rahe Hai Ye Sawal Rah Gaya | Jagjit Singh Gazal
Jyoti 2.7*
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Kiske Liye Jee Rahe Hai Ye Sawal Rah Gaya | Jagjit Singh Gazal
ग़ज़ल - "किसके लिए जी रहे हैं"
मतला
किसके लिए जी रहे हैं, ये सवाल रह गया, घर तो बना लिया, मगर घर कहाँ रह गया।
सुबह से शाम तक बस भागते रहे हम, जिसे ज़िंदगी कहते थे, वो कहाँ रह गया।
जेब में पैसे आए तो रिश्ते बढ़ गए, जेब ज़रा खाली हुई, सब दूर हो गए।
कल तक जो पूछते थे हाल हर रोज़ मेरा, आज सामने मिले तो मजबूर हो गए।
बाप ने उम्र भर चुपचाप बोझ उठाया, हमने समझा कि उसे कोई थकान नहीं।
माँ ने हर बार कहा, "मैं बिल्कुल ठीक हूँ," उसकी आवाज़ में मगर पहले वाली जान नहीं।
बचपन में सोचा था बड़ा होकर खुश होंगे, बड़े हुए तो बचपन ही याद आने लगा।
ख़्वाबों के पीछे इतना दूर निकल आए, कि अपना ही चेहरा अजनबी नज़र आने लगा।
मुखड़ा
हम...
सब कुछ कमाने निकले थे,
और...
वक़्त हार बैठे।
जिस सुकून को...
ढूँढते रहे उम्र भर,
उसे...
बचपन में...
छोड़ आए।
यहाँ...
इंसान की क़दर अक्सर...
उसकी जेब से होती है।
गरीब...
सही होकर भी...
कटघरे में खड़ा रहता है,
और...
अमीर...
ग़लत होकर भी...
सलाम पाता है।
आज...
किसी के पास...
बात करने का वक़्त नहीं।
कल...
शायद...
किसी के पास...
शायद...
किसी के पास...
सुनने वाला भी नहीं होगा।
अंतिम शेर
"फ़लक" ज़िंदगी का हिसाब जब बैठकर किया, तो कमाई बहुत थी, मगर सुकून कम मिला।
सबको खुश करने में उम्र निकल गई अपनी, आख़िर में पूछा ख़ुद से-"तू ख़ुद कब जिया?"