Our first mistake: Seeking happiness in the world. | KRIPALU JI |
Radha Govind Mandir, Chandigarh
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Our first mistake: Seeking happiness in the world. | KRIPALU JI |
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Radha Govind Mandir, Chandigarh
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हमारी पहली गलती : हमने समझा संसार में किसी से सुख मिल सकता है ||
रसमय उपदेश :
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की काव्य रचनाओं में जो रस सिक्त तत्त्वज्ञान भरा है, वह इस बात का द्योतक है कि उनका अपना व्यक्तित्व भक्ति के परमोज्ज्वल स्वरूप से ऊर्जस्वित, जीव कल्याण की करुणामयी भावना से द्रवित एवं श्रीराधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम रस से ओतप्रोत है। भक्तियोगरसावतार की उपाधि प्राप्त श्री कृपालु जी महाराज हमारे वर्तमान विश्व के पाँचवें मूल जगद्गुरु हैं। वेद-शास्त्रों के प्रमाणों पर आधारित उनके सारगर्भित प्रवचन तो वैदिक हिन्दू सनातन धर्म के वास्तविक सिद्धान्त को सरलता एवं स्पष्टता से समझने का प्रमुख आधार हैं ही, उनकी सरस संगीतमय संकीर्तन रचनाएँ भी सिद्धांत ज्ञान से परिपूरित हैं। श्री महाराज जी द्वारा रचित रसमय संगीतात्मक काव्य कृतियों में कितना गहन तत्त्व ज्ञान लबालब भरा है, इसका वास्तविक परिचय तब मिलता है जब वे स्वयं अपने स्वरचित संकीर्तनों की व्याख्या करते हैं। ये बहुत आकर्षक व्याख्याएँ हैं, जिनमें रस (भक्तियोगरसावतार) एवं उपदेश (जगद्गुरूत्तम) का कृपामय सामंजस्य है।
यह वीडियो 'युगल रस' नामक काव्य संग्रह के एक रसमय संकीर्तन—
'लागी नहिं छूटे अब कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।'
की व्याख्या
(मनगढ़ साधना, दिनांक : 09.10.2000)
पर आधारित है, जिसकी माधुरी का पान करते-करते सहज ही परमोत्कृष्ट उपदेश साधक के अंतर्मन में उतर जाता है।
इस वीडियो के कुछ अंश हैं—
"संसार में कोई किसी से प्रेम कर ही नहीं सकता। इम्पॉसिबल।
प्रेम दूसरे के निमित्त होता है।
और संसार का प्रेम अपने निमित्त होता है।
इतना बड़ा अन्तर है।
प्रेम का मतलब है, हम जिससे प्रेम करते हैं
उसके ही सुख के लिये
अपना जीवन अर्पित कर दें,
उसको प्रेम कहते हैं।
और जो अपने सुख के लिये हो, वो प्रेम नहीं, उसका नाम है काम। उसका उल्टा।
******
सब संसारी प्यार स्वार्थ पर निर्भर है।
बातें बड़ी लम्बी-लम्बी करते हैं।
साथ ही मरेंगे, साथ ही जियेंगे,
ऐसे वादे करते हैं लड़के-लड़कियाँ।
लेकिन कोई भी किसी के लिये
कुछ भी नहीं कर सकता।
सब अपने स्वार्थ के लिये करते हैं।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।
वेद कह रहा है,
अपने सुख के लिये ही प्रत्येक व्यक्ति
किसी से प्यार करता है।
ध्यान दो इस बात पर! मरने तक काम देगा।
संसार में कोई भी व्यक्ति
अपने सुख के लिये ही किसी से प्यार करेगा।
वो माँ हो, बाप हो, भाई हो,
बीवी हो, पति हो, कोई हो।
अगर यह ज्ञान पक्का हो जाये आपके हृदय में
तो सम्पूर्ण संसार से वैराग्य हो जाये।
बिना कहे, बिना प्रैक्टिस किये।"
—जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज
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कलियुग में दान को ही कल्याण का एकमात्र माध्यम बताया गया है। 'दानमेकं कलौयुगे'।
दान पात्र के अनुसार ही अपना फल देता है तथा भगवान एवं महापुरुष के निमित्त किया गया दान सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करता है।
हम साधारण जीव यथार्थ में यह नहीं जान सकते कि वास्तविक महापुरुष के प्रति किया गया हमारा दान/समर्पण हमारे कल्याण का कैसा अद्भुत द्वार खोल देगा। अतएव, समर्पण हेतु आगे बढिये।
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