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अलका सरावगी के उपन्यास में गांधी–सरला देवी : रिश्ता और टकराव

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अलका सरावगी के उपन्यास में गांधी–सरला देवी : रिश्ता और टकराव

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Review of Gandhi and Saraladevi Chaudhrani: Twelve Chapters by Alka Saraogi अलका सरावगी के नवीनतम उपन्यास में गांधी और सरला देवी चौधरानी के बीच जो “असाधारण रिश्ता” और “बौद्धिक टकराव” उभरता है, वह भारतीय आधुनिकता, स्त्री-विमर्श और आध्यात्मिक-राजनीतिक संघर्षों के नए पाठ की तरह देखा जा सकता है। गांधी और सरला देवी का संबंध उपन्यास में केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और वैचारिक जटिलता का प्रतीक है। गांधी के लिए यह रिश्ता एक “सत्याग्रही प्रेम” का प्रयोग है— आत्मसंयम, सेवा और आत्मशुद्धि के बीच की यात्रा। सरला देवी के लिए यह स्वयं की पहचान और स्वतंत्रता की खोज है— वह गांधी के प्रति गहरा आकर्षण रखती हैं, परंतु उसी में अपनी आत्मा की गरिमा को बचाने की चुनौती भी महसूस करती हैं। यह रिश्ता प्रेम और तप, आकर्षण और दूरी, पुरुष नेतृत्व और स्त्री चेतना — इन सबका संगम बन जाता है। यहाँ दोनों के विचार टकराते हैं — गांधी नैतिक अनुशासन और ब्रह्मचर्य को सर्वोच्च मानते हैं। सरला देवी रचनात्मकता, सौंदर्य और व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को आत्मानुभूति का केंद्र मानती हैं। यह टकराव भारतीय समाज में पुरुष-आधारित नैतिकता और स्त्री की बौद्धिक स्वतन्त्रता के बीच संवाद को उजागर करता है। सरावगी इस संवाद को किसी पक्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल मानवीय स्थिति के रूप में प्रस्तुत करती हैं — जहाँ प्रेम और विवेक एक-दूसरे को चुनौती देते हैं। वह गांधी की महानता के साथ-साथ उनकी सीमाएँ भी दिखाती हैं। सरला देवी के माध्यम से वह यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या स्त्री की आत्मा भी ‘राष्ट्र’ और ‘नीति’ के नाम पर तप की वस्तु हो सकती है? इस तरह, यह उपन्यास एक बौद्धिक और भावनात्मक पुनर्मूल्यांकन है — जहाँ इतिहास एक जीवित संवाद बन जाता है, न कि स्थिर श्रद्धा। Link for Masterclass on Alka Saraogi    • Alka Saraogi - Writer's Journey - A Master...