शरीर सिर्फ़ किराए का घर है… इससे इतना मोह क्यों? | अष्टावक्र गीता #ashtavakragita #अष्टावक्रगीता
Spiritual Tushar
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शरीर सिर्फ़ किराए का घर है… इससे इतना मोह क्यों? | अष्टावक्र गीता #ashtavakragita #अष्टावक्रगीता
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शरीर सिर्फ़ किराए का घर है… लेकिन फिर भी हमें इस शरीर से इतना मोह क्यों है?
अष्टावक्र गीता की दृष्टि से देखें तो शरीर लगातार बदल रहा है। बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था—शरीर हर क्षण परिवर्तनशील है। फिर भी हम इसी शरीर को अपना वास्तविक स्वरूप मान लेते हैं और इसके सुख-दुःख, सौंदर्य, बीमारी, उम्र और मृत्यु से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं।
इस वीडियो में अष्टावक्र गीता के आत्मज्ञान और साक्षी भाव की शिक्षाओं के आधार पर समझेंगे कि शरीर के प्रति हमारा मोह क्यों पैदा होता है और स्वयं को शरीर से अलग देखने का अर्थ क्या है।
क्या मैं वास्तव में यह शरीर हूँ?
अगर शरीर बदल रहा है, तो उस बदलाव को देखने वाला कौन है?
अगर शरीर को मैं देख सकता हूँ, तो क्या मैं केवल शरीर हो सकता हूँ?
राजा जनक और अष्टावक्र के संवाद के माध्यम से हम समझेंगे कि शरीर, मन, विचार और साक्षी चेतना में क्या अंतर है।
इस वीडियो में जानिए:
• शरीर से मोह क्यों होता है?
• शरीर नश्वर होने के बावजूद हम उससे क्यों चिपके रहते हैं?
• क्या मैं वास्तव में यह शरीर हूँ?
• आत्मा और शरीर में क्या अंतर है?
• साक्षी भाव क्या है?
• शरीर को देखते हुए स्वयं को कैसे पहचानें?
• मृत्यु का भय शरीर की पहचान से कैसे जुड़ा है?
• अष्टावक्र गीता शरीर के बारे में क्या सिखाती है?
• आत्मज्ञान में शरीर की क्या भूमिका है?
• “मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न की वास्तविक खोज क्या है?
अष्टावक्र की शिक्षा शरीर से घृणा करने की बात नहीं करती; बल्कि हमें यह देखने की ओर ले जाती है कि शरीर परिवर्तनशील है और अपने वास्तविक स्वरूप की खोज शरीर से आगे करनी है।
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और Comment में लिखिए:
“मैं शरीर नहीं हूँ, मैं साक्षी हूँ।”
आपके लिए शरीर से मोह छोड़ना ज्यादा कठिन है या मृत्यु के भय से मुक्त होना?
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