माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 28 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
AnandVrindavan
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 28 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
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परम पूज्य महाराजश्री द्वारा माण्डूक्यकारिका के अद्वैत प्रकरण पर दिया गया है। इसमें परमात्मा के स्वरूप और अद्वैत ज्ञान की गहन व्याख्या की गई है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. परमात्मा का स्वरूप और अग्राह्यता (00:03:50 - 00:06:00): परमात्मा का स्वरूप 'अज' (अजन्मा) और 'अग्राह्य' है। इसे अपने प्रयत्न या इंद्रियों से नहीं पकड़ा जा सकता। यह केवल उसकी कृपा से ही अभिव्यक्त होता है।
2. ज्ञान की प्रक्रिया (00:09:50 - 00:13:45): वेदांत में 'वृत्ति व्याप्ति' और 'फल व्याप्ति' का भेद समझाया गया है। ब्रह्म के ज्ञान में प्रकाश रूप वृत्ति तो होती है, लेकिन संसार की वस्तुओं की तरह 'फल व्याप्ति' (अहंकार का जुड़ना) नहीं होती।
3. नेति-नेति की प्रक्रिया (00:18:50 - 00:35:30): द्वैत का निषेध करने के लिए 'नेति-नेति' का प्रयोग किया जाता है। इसमें केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि देश, काल और संपूर्ण ब्रह्मांड का निषेध करके अखंड आत्मा की स्थिति को समझा जाता है।
4. अद्वैत और वादी का भेद (00:42:40 - 00:45:30): परम पूज्य महाराजश्री स्पष्ट करते हैं कि वे 'अद्वैतवादी' नहीं, बल्कि केवल 'अद्वैत' हैं। द्वैत और अद्वैत के झगड़े से परे आत्म-स्वरूप की अखंडता ही परम सत्य है।
5. अवस्थाओं का विवेक (00:47:38 - 00:50:30): जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में आत्मा का अन्वय (व्याप्ति) और उनका परस्पर व्यतिरेक (अलग होना) समझाते हुए बताया गया है कि अंततः आत्मा न तो किसी में व्यापक है और न ही किसी में व्याप्त, वह स्वयं प्रकाश है।
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