माँ बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़ - नवरात्रि 2026 Maa Bamleshwari #dongargarh #navratri #bamleshwari
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माँ बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़ - नवरात्रि 2026 Maa Bamleshwari #dongargarh #navratri #bamleshwari
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छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की सुरम्य वादियों में स्थित माँ बम्लेश्वरी देवी का पावन धाम नवरात्रि के पावन पर्व पर आस्था और भक्ति के अलौकिक रंग में रंग चुका है। लगभग 1,600 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजित माँ बड़ी बम्लेश्वरी और तलहटी में स्थित माँ छोटी बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए देश भर से लाखों श्रद्धालु डोंगरगढ़ पहुँच रहे हैं।
नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर प्रांगण का दृश्य अत्यंत भव्य और दिव्य होता है। पहाड़ी की चोटी तक जगमगाती रोशनी, गूंजते देवी मंत्र और मनोकामना ज्योतिकलशों की अविरल श्रृंखला पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहाँ लगभग 1,000 सीढ़ियों के पारंपरिक मार्ग के साथ-साथ सुगम रोपवे (Ropeway) की व्यवस्था भी उपलब्ध है।
मनोकामना ज्योति कलश: हजारों की संख्या में प्रज्वलित अखंड दीप, जो श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का प्रतीक हैं।
24 घंटे दर्शन सुविधा: नवरात्रि पर्व के दौरान भक्तों की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए मंदिर के पट दिन-रात खुले रहते हैं।
विशाल मेला: पहाड़ी की तलहटी में लगने वाला पारंपरिक मेला, जहाँ पूजा-सामग्री, स्थानीय हस्तशिल्प और खानपान के विविध स्टॉल उपलब्ध हैं।
यातायात व रेल सुविधा: डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन (हावड़ा-मुंबई रूट) से मंदिर तक पहुँचने के लिए चौबीसों घंटे ऑटो, ई-रिक्शा और विशेष लोकल ट्रेनों का संचालन।
यदि आप नवरात्रि 2026 में माँ के दरबार में हाजिरी लगाने की योजना बना रहे हैं, तो सुबह की मंगला आरती और संध्या महाआरती का दर्शन अवश्य करें।
दर्शन का समय: सामान्य दिनों में सुबह 5:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक, और शाम 3:00 बजे से रात 9:00 बजे तक (पर्व व नवरात्रि में दर्शन 24 घंटे खुले रहते हैं)।.
नवरात्रि: आस्था, साधना और शक्ति की उपासना का महापर्व
सनातन संस्कृति में नवरात्रि का पर्व आत्मिक शुद्धि, भक्ति और शक्ति संचय का प्रतीक माना गया है। 'नव' का अर्थ नौ और 'रात्रि' का अर्थ रातें—यानी नौ पावन रातों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों (नवदुर्गा) की विशेष साधना की जाती है। यह पर्व असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय (महिषासुरमर्दिनी स्वरूप) का स्मरण कराता है।
नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु घटस्थापना कर अखंड ज्योति प्रज्वलित करते हैं, उपवास रखते हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि प्रकृति और ऋतु परिवर्तन के साथ शरीर व मन को संतुलित करने का आध्यात्मिक समय भी है। अंतिम दिनों में कन्या पूजन (कंजक) के साथ नौ दिनों के इस महापर्व का विधिवत समापन होता है।