मूर्ति उपासना अथवा निराकार ब्रह्म का ध्यान | किसको सत्य माने | ईशावस्योपनिषद मन्त्र 12
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मूर्ति उपासना अथवा निराकार ब्रह्म का ध्यान | किसको सत्य माने | ईशावस्योपनिषद मन्त्र 12
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अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ (12)
घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं वह जो अव्यक्त की उपासना करते हैं।
उनसे अधिक वह अंधकार को जो सगुण ब्रह्म में(उपासना में) रत हैं।
अन्यत एव आहुः सम्भवात अन्यत आहुः असम्भवात,
इति शुश्रुम (वचनों से) धीराणाम ये नः तत विचचक्षिरे (व्याख्या से समझाया)
(13)
ज्ञानियों ने निश्चित रूप से हमें समझाया है
की व्यक्त की उपासना का एक परिणाम है
और अव्यक्त की उपासना का भी
अपना भिन्न परिणाम है।
सम्भूतिम च विनाशम च यः तत वेद उभयम सह
विनाशेन मृत्युम तीर्त्वा सम्भूत्या अमृतम अश्नुते। 14.
अदि गुरु शंकराचार्य के अनुसार सम्भूति को यहां असम्भूति रूप में पढ़ना चाहिए (व्याकरण दृष्टि)
भावार्थ; जो जीव जानते हुए अव्यक्त ईश्वर एवं व्यक्त(विनाशम)दोनों की उपासना करता है वह व्यक्त ईश्वर की उपासना के परिणाम से मृत्यु चक्र से मुक्त हो जाता है और अव्यक्त की उपासना के फलस्वरूप वह अमरता को प्राप्त करता है।
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सूर्योदय से पूर्व का समय ब्रह्म मुहूर्त के नाम से जाना जाता है। यह वह अद्भुत चमत्कारिक पल होते हैं जिनके सदुपयोग के द्वारा मनुष्य अपने भीतर बहुत कुछ विकसित और बदल सकता है। इसे अमृत बेला यूँ ही नहीं कहा जाता, इन क्षणों में प्रकृति शान्त और जागृत होती है। सूक्ष्म ऋषि सत्ताएं ज्ञानियों के अनुसार इस समय एक विशेष प्रवाह प्रसारित करती हैं। वह प्रवाह अनेकों स्तरों पर हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है। इतना ही नहीं और भी बहुत कुछ।
ध्यान एक अवस्था है जिसकी तैयारी मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन आचरण से हो कर ही जाती है। कहते हैं न की जो भाव जीव के भीतर उसके अंतिम क्षण में होता है वही उसके अगले जन्म का आधार बनता है। यहाँ एक भाव समझने योग्य महत्वपूर्ण है की वह अंतिम क्षण का भाव भी सम्पूर्ण जीवन की तैयारी का ही परिणाम होता है , ठीक उसी प्रकार ध्यान भी एक लम्बी तैयारी की फलश्रुति है। श्रीमद भगवद गीता से अधिक सुंदर स्वरूप में यह बोध और अन्य कहाँ प्राप्त होता है।
इस सम्पूर्ण विवेचना को आप एक अध्यापक की कक्षा जान कर ही पढ़ना। #gitaonline #ishavasya #upanishads