पलकों पे कुछ पल ठहरे हैं अभी—या मैं ही उन पलों में ठहरी हूँ?
Dhiraj pathak
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पलकों पे कुछ पल ठहरे हैं अभी—या मैं ही उन पलों में ठहरी हूँ?
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Dhiraj pathak
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वक़्त को काग़ज़ पे लिखने चले थे,
वक़्त ने हमको फ़साना बना दिया।
एक चाहत दिल में ठहरी रह गई,
हमने उस चाहत को नग़मा बना दिया।
एक चेहरा था, जिसे कहना था कुछ,
एक ख़ामोशी थी, कहती ही रही।
कहने की आस में बात रह गई,
उम्र गुज़री... वो चाहत वहीं रही।
वक़्त को काग़ज़ पे लिखने चले थे,
वक़्त ने हमको फ़साना बना दिया।
एक चाहत दिल में ठहरी रह गई,
हमने उस चाहत को नग़मा बना दिया।
बाग़ छूटा, पर महक जाती कहाँ,
फूल अपनी ख़ुशबुओं में ही रहे।
ज़िंदगी ने बस ठिकाने बदल दिए,
रंग दिल के फिर भी वैसे ही रहे।
वक़्त को काग़ज़ पे लिखने चले थे,
वक़्त ने हमको फ़साना बना दिया।
एक चाहत दिल में ठहरी रह गई,
हमने उस चाहत को नग़मा बना दिया।
वक़्त ने रोका था या मोड़ा हमें,
आज तक ये फ़ैसला होता नहीं।
जिसको हम दीवार कहते रह गए,
शायद उसमें ही कोई दर था कहीं।
जो मिला, उसने हमें भरपूर किया,
जो न मिला, वो बुलाता ही रहा।
मैंने वक़्त को लिखना चाहा था,
वो मुझे चुपचाप लिखता ही रहा।
पलकों पे कुछ पल ठहरे हैं अभी—
या मैं ही उन पलों में ठहरी हूँ?
वक़्त को काग़ज़ पे लिखने चले थे,
वक़्त ने हमको फ़साना बना दिया।
जो न कह सकी, वही धुन बन गई,
हमने उस चाहत को नग़मा बना दिया।
पलकों पे कुछ पल ठहरे हैं अभी—
या मैं ही उन पलों में ठहरी हूँ?
वक़्त को काग़ज़ पे लिखने चले थे...
वक़्त ने हमको फ़साना बना दिया...