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प्रकृति भले विपरीत खड़ी हो || Prakruti Bhale Viprit Khadi Ho || RSS || राष्ट्रचिंतक || Rashtrachintak

राष्ट्र चिंतक

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प्रकृति भले विपरीत खड़ी हो || Prakruti Bhale Viprit Khadi Ho || RSS || राष्ट्रचिंतक || Rashtrachintak

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राष्ट्र चिंतक
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#rss #sanghgeet #shatabdivarsh #deshbhaktigeet #rashtriyaswayamsevaksangh #bharatmata #rashtrabhakti  #sangathan प्रकृति भले विपरित खड़ी हो, कालचक्र भी पड़े थामना संकट के तूफानी सागर, चीर करेंगे सफल सामना सतत् हमारी यही योजना, नित्य हमारी यही साधना – धृ विकट परिस्थिति गुप्त सभी कुछ, रूप अनिश्चित अति अद्रश्य है किन्तु सजग निर्भय सधैर्य हो, करना निश्चित धर्म-कृत्य है अविरल जीवन चले जगत् में, सृष्टि धर्म की यही कल्पना – २ नित्य हमारी यही साधना नये-नये ढंग विकसित होंगे, नयी-नयी पद्धति आयेंगी संस्कृति वही पुरानी अपनी, जन-जीवन को सरसायेगी चक्र-अखंडित यही सृष्टि का, यही सृजन की सहज धारणा – २ नित्य हमारी यही साधना विघ्नों के गिरि अचल अनामिक, कदम-कदम हर पग रोकेंगे भरी दुपहरी का रवि ग्रस लें, ऐसे राहु-केतु डोलेंगे किन्तु अटल निर्बाध बढ़ें हम, जीवन की गति सहज भावना – २ नित्य हमारी यही साधना सुख-दुःख-विपदा-बाधा-सुविधा, यही मार्ग मीलों के पत्थर किन्तु इसी में आनंदित हो, खोजें हम उन्नति के अवसर विजय सुनिश्चित भरतभूमि की, चाहे सागर पड़े बांधना – २ नित्य हमारी यही साधना