सब जानते हैं, फिर भी बदलते क्यों नहीं? | अद्वैत बोध | Advaita Vedanta in Hindi
DFC4U | अद्वैत बोध
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सब जानते हैं, फिर भी बदलते क्यों नहीं? | अद्वैत बोध | Advaita Vedanta in Hindi
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शर्मा जी 20 साल से रोज़ सुबह गीता पढ़ते थे – "न जायते म्रियते वा कदाचित्" उन्हें ज़ुबानी याद था – फिर भी भीड़ भरे प्लेटफ़ॉर्म पर किसी ने उनकी रिज़र्व सीट ले ली, तो वे आगबबूला हो गए। सब जानते हैं, फिर भी बदलते क्यों नहीं?
परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान, तीन बाधाएँ और उनके उपाय – श्रवण, मनन, निदिध्यासन – चाय की टपरी पर जल्प-वितंडा-वाद, "मैं हूँ" का छोटा प्रयोग, सरसों के तेल की धार और दसवें आदमी की कहानी – अद्वैत वेदांत की सरल हिंदी चर्चा।
⏱️ चैप्टर्स
00:00 शर्मा जी को सब पता था, फिर भी?
00:28 प्लेटफ़ॉर्म पर शर्मा जी को गुस्सा क्यों आया?
00:58 जानना और होना – बीच की दूरी कहाँ है?
01:16 परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान में फ़र्क़ क्या है?
02:09 पहली बाधा: ग्रंथ कह क्या रहे हैं? (श्रवण)
02:56 दूसरी बाधा: क्या ये संभव है? (मनन)
03:22 चाय की टपरी: जल्प, वितंडा या वाद?
04:28 क्या असली चीज़ तो ध्यान है?
05:02 प्रयोग: "मैं हूँ" जानने के लिए क्या किताब चाहिए?
05:22 तीसरी बाधा: पुरानी आदत क्यों लौटती है?
05:54 निदिध्यासन: सरसों के तेल की धार
07:04 दसवें आदमी की कहानी
08:20 आपके और सत्य के बीच दूरी कहाँ है?
08:44 आज की बात का सार क्या है?
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