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विरासत ०१ | बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु | Baandho Na naav | Suryakant Tripathi Nirala | kavita

शौरसेनी

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विरासत ०१ | बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु | Baandho Na naav | Suryakant Tripathi Nirala | kavita

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शौरसेनी
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विरासत ०१ | बाँधो न नाव | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला क्या ‘बाँधो न नाव इस ठाँव’ केवल प्रेयसी की स्मृतियों में डूबे एक विरही हृदय का गीत है, अथवा यह जीवात्मा का परमात्मा से होता कोई अनकहा संवाद भी है? इस गीत की संवेदना में प्रेम की स्मृतियाँ हैं, विरह की आर्द्रता है और आध्यात्मिक अनुभूति की एक रहस्यमयी आभा भी। बंगाल की सांस्कृतिक भूमि, जहाँ निराला का जन्म हुआ, अपने लोकजीवन के साथ ढोल-मादल की लयात्मक अनुगूँज समेटे हुए है; वहीं उनकी कर्मभूमि प्रयागराज का संगम-तट भारतीय आस्था, स्मृति और अध्यात्म का विराट प्रतीक बनकर उपस्थित होता है। हिंदी कविता के महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के इस गीत में प्रेम, प्रकृति, स्मृति और अध्यात्म के कौन-से रूप एक-दूसरे में घुलते-मिलते हैं? आइए, इस गीत की तहों में उतरकर उसके भाव-संसार और अर्थ-गांभीर्य को समझने का प्रयास करें। बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! पूछेगा सारा गाँव, बंधु! यह घाट वही जिस पर हँसकर, वह कभी नहाती थी धँसकर, आँखें रह जाती थीं फँसकर, कँपते थे दोनों पाँव, बंधु! वह हँसी बहुत कुछ कहती थी, फिर भी अपने में रहती थी, सबकी सुनती थी, सहती थी, देती थी सबके दाँव, बंधु! स्रोत : पुस्तक : निराला संचयिता (पृष्ठ 154) संपादक : रमेशचंद्र शाह रचनाकार : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला प्रकाशन : वाणी प्रकाशन संस्करण : 2010 👍 वीडियो पसंद आए तो Like करें। 💬 अपने विचार Comment में साझा करें। 🔔 ऐसी ही साहित्यिक प्रस्तुतियों के लिए चैनल को Subscribe करें। #nirala #suryakanttripathinirala #kavita #ugcnet #upsc #kavi #kavisammelan #sahitya #poetry #kavisammelan #kavita #poet