माता, पिता, पितर: परंपरा सम्मान को कैसे क्रम देती है | पितृ पक्ष कथा | धर्म कथा EP 48
Dharma Katha धर्म कथा
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माता, पिता, पितर: परंपरा सम्मान को कैसे क्रम देती है | पितृ पक्ष कथा | धर्म कथा EP 48
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Dharma Katha धर्म कथा
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उपनिषदों में एक क्षण आता है जब एक गुरु अपने शिष्यों से अंतिम बार विदा लेते हैं।
वे वर्षों उनके साथ पढ़ चुके हैं। अब वे वन की पाठशाला छोड़कर घर जाने वाले हैं, विवाह करने, काम करने, संसार में जीने। और गुरु उन्हें इकट्ठा करके अपना अंतिम उपदेश देते हैं। वह दर्शन के बारे में नहीं है। वह जीने के ढंग के बारे में है।
धर्म कथा — सीज़न 1: पितृ पक्ष — एपिसोड 48
स्रोत: Taittiriya Upanishad 1.11.2 (full Devanagari verified, shlokam.org)
▶ पूरा सीज़न देखें: • धर्म कथा सीज़न 1: पितृ पक्ष की कथाएँ (हिंदी)
🎧 पॉडकास्ट पर सुनें: https://rss.com/podcasts/dharma-katha...
पिछला भाग: एपिसोड 47।
स्रोत। श्रेणी: शास्त्र। अंश तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षावल्ली, प्रथम वल्ली, ग्यारहवाँ अनुवाक, श्लोक दो है: देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्, मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव, यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि, यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि। संस्कृत shlokam.org साइट के एक प्रकाशित संस्करण से देवनागरी में उद्धृत है। अर्थ वहाँ दिए अनुवाद के अनुसार, अनुकूलित। कुछ संस्करण मित्रदेवो भव या पुत्रदेवो भव जैसी पंक्तियाँ जोड़ते हैं; मैंने चार-पंक्ति वाले पाठ का अनुसरण किया है। यक्ष प्रश्न का श्लोक महाभारत से है, जैसा एपिसोड तेईस में, और वैतरणी का अंश गरुड़ पुराण सारोद्धार, अध्याय चार, श्लोक चौदह है। चिंतन मेरे अपने हैं। प्रकाशन से पहले किसी संस्कृत जानकार से पाठ की पुष्टि करा लेनी चाहिए।
सूचना: श्लोक प्रकाशित संस्करणों से उद्धृत हैं; उन पर निर्भर होने से पहले किसी संस्कृत विद्वान से जाँच करा लें।
इस कथा का वाचन AI आवाज़ में किया गया है।
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