राधाष्टमी विशेष स्तोत्र | Radha Ashtami Special | Sri Pundrik Goswami Ji Maharaj
Sri Pundrik Goswami
0:00 / 0:00
राधाष्टमी विशेष स्तोत्र | Radha Ashtami Special | Sri Pundrik Goswami Ji Maharaj
45 478 просмотров · 1 день назад
Sri Pundrik Goswami
2,1 млн подписчиков
45 478 просмотров · 1 день назад
राधाष्टमी विशेष स्तोत्र | Radhashtami Special | Sri Pundrik Goswami Ji Maharaj
On the sacred occasion of Radhashtami, Sri Pundrik Goswami Ji Maharaj shares a beautiful and rare Shri Radha Stavan in Sanskrit, along with its simple meaning and the devotion behind its recitation.
Maharaj Ji speaks about the glory of Sri Radha Rani, the significance of Radhashtami in Braj, and how devotees can lovingly celebrate this divine festival at home. He explains the importance of offering flowers, performing abhishek, remembering Shri Radha’s name and taking shelter of Her lotus feet.
Maharaj Ji also shares the background of this Shri Radha Stavan, which came to him through the Radha Raman tradition and was composed by his revered Guru Maharaj, Pujya Pad Atul Krishna Goswami Ji Maharaj. He encourages devotees to recite this Stavan with devotion on Radhashtami and offer flowers at the lotus feet of Shri Radha Rani.
The video also includes reflections on Radha Naam, Shri Radha Rani’s divine appearance in Braj, Radha Raman Ji, Guru Parampara, Braj Bhakti and the path of divine प्रेम and माधुर्य.
॥ श्रीराधा-स्तवन ॥
या वृन्दाविपिनेश्वराधरसुधास्वादैक चिन्ताकुला,
या भक्ताग्रह दर्शनैक फलदा माधुर्य मध्वाश्रया।
या गोपी नयनोत्पलार्चिततनुस्मेराननार्थप्रदा,
सा राधा विदधातु चित्तममलं सौख्यं शुभं मे सदा॥१॥
भावार्थ:
जो श्रीराधा जी वृन्दावन के स्वामी श्रीकृष्ण के अधरामृत का आस्वादन करने के लिए सदा व्याकुल रहती हैं, जो अपने दर्शन की उत्कट इच्छा रखने वाले भक्तों को दर्शन प्रदान करती हैं और जो माधुर्य-रूपी अमृत की आश्रय हैं।
जिनके दिव्य शरीर की गोपियों के कमल-सदृश नेत्रों से पूजा होती है और जिनका मुस्कुराता हुआ मुख अत्यन्त मनोहर है—वही श्रीराधा मेरे चित्त को सदा निर्मल, सुखमय और मंगलमय करें।
यस्या नाम सुधा सुधारण विधौ धातापि लोलायते,
यां लब्ध्वा पशुपांगजोऽपि वसुधां वासं सदा याचते।
या ह्लादैक परायणा सुमनसां प्रेमांघ्रि मार्गाधिपा,
सा राधा किल दृक कृतार्थयतु मे श्रीकुञ्जरंगाश्रया॥२॥
भावार्थ:
जिनके “राधा” नाम की अमृतमयी सुधा को प्राप्त करने के लिए स्वयं ब्रह्माजी भी लालायित होते हैं; जिन्हें प्राप्त करके पशुपालक के पुत्र श्रीकृष्ण भी सदा पृथ्वी पर उनके साथ निवास करने की इच्छा करते हैं।
जो शुद्ध हृदय वाले भक्तों के लिए परमानन्द का आश्रय हैं और प्रेम-सागर तक पहुँचने के मार्ग की अधीश्वरी हैं—श्रीकुञ्जों में निवास करने वाली वही श्रीराधा मुझे शीघ्र कृतार्थ करें।
संसारात् यदि पारमिच्छसि सखे! संताप दावानलात्,
स्वाढ़यां वाञ्छसि चेत् परां रससुधां प्रेमामुरागान्विताम्।
माधुर्या तिश्येक कुञ्जविपिने वासाभिलाषास्ति चेत्,
श्रीराधा पदपङ्कजं भज सदा गोपी गणैः सेवितम्ं॥३॥
भावार्थ:
हे मित्र! यदि तुम संसार-सागर को पार करना और संसार के दुःखरूपी दावानल से मुक्त होना चाहते हो;
यदि तुम प्रेम और अनुराग से युक्त परम मधुर रसामृत का आस्वादन करना चाहते हो;
और यदि तुम्हारे हृदय में माधुर्यमयी श्रीराधा के कुञ्ज-वृन्दावन में निवास करने की अभिलाषा है, तो सदा उन श्रीराधा के चरण-कमलों का भजन करो, जिनकी गोपियों का समूह भी सेवा करता है।
राधा नाम रसं सदैव रसना धारा समास्वादयेत्,
माधुर्यान्वित नैक नित्य नवलं रूपं च चित्तं श्रयेत्।
तत्सेवामय जीवन प्रतिदिनं कुञ्जे निवासं भवेत्,
तत्प्राणेश्वर नामधाम युगले निष्ठा सदा वर्धयेत्॥४॥
भावार्थ:
मेरी जिह्वा सदा “राधा” नाम के रस का निरन्तर आस्वादन करती रहे।
मेरा चित्त उनके माधुर्य से युक्त, नित्य नवीन दिव्य स्वरूप में सदा लगा रहे।
मेरा जीवन श्रीराधा की सेवा से परिपूर्ण हो और प्रतिदिन उनके दिव्य कुञ्जों में निवास की भावना बनी रहे।
और श्रीराधा के प्राणेश्वर श्रीकृष्ण तथा श्रीराधा—इन दोनों के नाम और धाम में मेरी निष्ठा निरन्तर बढ़ती रहे।
चित्तानन्द प्रदं मनोमल हरं गोविंद परेमास्पदं,
संसारानल तीव्र तापशमनं सद्भाव संपोषणम्।
ब्रह्मोपेन्द्र सुरेंद्र रुद्र वरुणैः सदा सेवितम्,
सेवध्वं शुक नारदादि कथितं राधेति नामाक्षरम्॥५॥
भावार्थ:
“राधा” नाम चित्त को आनन्द प्रदान करने वाला और मन के समस्त मल को दूर करने वाला है।
यह नाम गोविन्द-प्रेम का आश्रय है, संसाररूपी अग्नि के तीव्र ताप को शांत करता है और हृदय में शुभ भावों का पोषण करता है।
जिसका स्मरण ब्रह्मा, उपेन्द्र, इन्द्र, रुद्र, वरुण आदि देवता भी करते हैं और जिसकी महिमा शुकदेव, नारद आदि महर्षियों ने कही है—ऐसे “राधा” नाम का सदा सेवन करना चाहिए।
#sripundrik #radhashtami #radharani #radheradhe #radhe #barsana #radhakrishna #krishnabhakti #sanatandharma