Shree Yogini Ekadashi Vrat Katha, भगवान श्री विष्णु की कृपा प्राप्त करने का दिव्य व्रत
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🌺 श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा | Shree Yogini Ekadashi Vrat Katha | भगवान श्री विष्णु की कृपा प्राप्त करने का दिव्य व्रत 🌺
जय श्री हरि! 🙏
इस वीडियो में प्रस्तुत है श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा, जो आषाढ़ कृष्ण पक्ष की पवित्र एकादशी के अवसर पर श्रद्धापूर्वक सुनाई गई है। शास्त्रों के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से समस्त पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है तथा भगवान श्री विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
इस वीडियो में:
✨ श्री योगिनी एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा
✨ व्रत का धार्मिक महत्व
✨ भगवान श्री विष्णु की महिमा
✨ आध्यात्मिक संदेश एवं पुण्यफल
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🙏 जय श्री हरि। जय श्री विष्णु।
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it is a story about Yogini Ekadashi Vrat Katha. it is the conversation between Yudhishthir and Lord Krishna where Lord Krishna was answering the question about the ekadashi and its greatness through a story of a yaksh Hemmali, his wife Vishalakshi, His master Kuber, his guide to life great sage Maharishi Markandeya.
श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—"हे जनार्दन! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसका माहात्म्य और व्रत की कथा कृपा करके सुनाइए।"
भगवान श्रीकृष्ण बोले—
"हे राजन्! यह एकादशी 'योगिनी एकादशी' के नाम से प्रसिद्ध है। इसका व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला तथा भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला है। अब मैं इसकी पवित्र कथा सुनाता हूँ, जिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था।
प्राचीन समय में अलकापुरी नामक दिव्य नगरी में धन के अधिपति कुबेर निवास करते थे। वे प्रतिदिन भगवान शिव की अत्यंत श्रद्धा से पूजा करते थे।
उनके यहाँ हेममाली नाम का एक यक्ष था, जिसका कार्य मानसरोवर से सुगंधित एवं ताजे पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करना था।
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। वह अत्यंत रूपवती थी। एक दिन हेममाली पुष्प लेकर घर आया, परंतु पत्नी के प्रेम में इतना आसक्त हो गया कि समय पर पुष्प लेकर कुबेर की सभा में नहीं पहुँचा। पूजा का समय निकल गया।
कुबेर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रतीक्षा करते रहे। जब बहुत देर हो गई तो उन्होंने अपने सेवकों को कारण जानने भेजा। सेवकों ने जाकर देखा कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ सुख-विलास में लीन है और अपने कर्तव्य को भूल गया है।
सेवकों ने लौटकर सारी बात कुबेर को बता दी। यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने हेममाली को बुलाकर कहा—
"दुष्ट! तूने भगवान शिव की सेवा में प्रमाद किया है। अपने स्वामी के कार्य की उपेक्षा करके विषय-भोग में लीन हुआ है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू कोढ़ से पीड़ित होगा और स्वर्ग से गिरकर पृथ्वी पर भटकता रहेगा।"
शाप मिलते ही हेममाली का दिव्य शरीर नष्ट हो गया। वह कोढ़ से ग्रस्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका शरीर घावों से भर गया और उसे असहनीय दुःख होने लगा।
वह जंगलों, पर्वतों और निर्जन स्थानों में भटकता रहा। भूख-प्यास और कष्ट सहते हुए भी उसे अपने पूर्व जन्म के पुण्यों के कारण अपनी भूल का स्मरण बना रहा।
एक दिन भटकते-भटकते वह महान तपस्वी महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम में पहुँचा। महर्षि ने उसे देखकर दया की और पूछा—
"वत्स! तुम इस अवस्था में कैसे पहुँचे?"
हेममाली ने हाथ जोड़कर अपना सम्पूर्ण अपराध स्वीकार किया और कहा—
"भगवन्! मैंने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की थी। उसी अपराध के कारण कुबेर ने मुझे यह शाप दिया है। कृपा करके ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा उद्धार हो सके।"
दयालु महर्षि मार्कण्डेय बोले—
"हे हेममाली! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की 'योगिनी एकादशी' का श्रद्धापूर्वक व्रत करो। भगवान श्रीहरि का पूजन करो, रात्रि में जागरण करो और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएँगे।"
हेममाली ने महर्षि के बताए अनुसार श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया।
व्रत के प्रभाव से उसका कोढ़ तत्काल दूर हो गया। उसका दिव्य, सुंदर शरीर पुनः प्राप्त हो गया। वह सभी पापों से मुक्त होकर पुनः अलकापुरी लौटा और अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। अंत में उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हुई।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा—
"हे राजन्! योगिनी एकादशी का व्रत अति दुर्लभ और महान फल देने वाला है। यह बड़े-बड़े पापों का भी नाश कर देता है। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत का पालन करता है, वह रोग, शोक और पापों से मुक्त होकर अंत में परम गति को प्राप्त करता है।"
॥ इति श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
व्रत का संदेश: कर्तव्य का पालन, भगवान के प्रति श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया प्रायश्चित्त मनुष्य के जीवन को बदल सकता है। योगिनी एकादशी का व्रत आत्मशुद्धि, पाप-क्षय और भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्त करने का पवित्र माध्यम माना गया है।