Перейти к содержимому

🚩सम्पूर्ण भगवत गीता - अध्याय -2 कृष्ण अर्जुन को कर्म, कर्त्यव्य, और निष्ठा का ज्ञान देते हैl 🚩🪈

Raj22aiCreater

0:00 / 0:00

🚩सम्पूर्ण भगवत गीता - अध्याय -2 कृष्ण अर्जुन को कर्म, कर्त्यव्य, और निष्ठा का ज्ञान देते हैl 🚩🪈

35 просмотров · 10 дн. назад
Raj22aiCreater
94 подписчика
35 просмотров · 10 дн. назад
संपूर्ण भागवत गीता -अध्याय 2 — सांख्य योग श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 — सांख्य योग कुरुक्षेत्र का मैदान। अर्जुन रथ में बैठा है। उसका गांडीव नीचे रखा हुआ है। उसकी आंखों में दुख और मन में गहरा भ्रम है। भगवान श्रीकृष्ण शांत भाव से उसकी ओर देखते हैं। श्रीकृष्ण बोले:कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।।अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥“हे अर्जुन! इस कठिन समय में तुम्हारे भीतर यह मोह और दुर्बलता कहाँ से आ गई? यह तुम्हारे योग्य नहीं है। यह तुम्हें न सम्मान देगा, न श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाएगा।”क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥“हे पार्थ! इस हृदय की दुर्बलता को अपने ऊपर हावी मत होने दो। इस छोटे से मोह को त्यागो और उठो।”अर्जुन हाथ जोड़कर कृष्ण की ओर देखता है। अर्जुन बोले:कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥“हे मधुसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य जैसे पूजनीय व्यक्तियों पर बाण कैसे चला सकता हूँ?”गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥“ऐसे महान गुरुओं को मारकर प्राप्त हुआ राज्य और सुख मुझे स्वीकार नहीं। उनसे भिक्षा मांगकर जीवन बिताना भी मुझे अधिक उचित लगेगा। क्योंकि यदि इन्हें मारकर हमें जो सुख मिलेगा, वह उनके रक्त से सना हुआ होगा।” अर्जुन की आंखों में आंसू। वह अपना सिर झुका देता है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेय एतन्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ “मेरा स्वभाव इस मोह और दुख से दब गया है। मेरा मन धर्म के विषय में भ्रमित हो चुका है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूं—मेरे लिए वास्तव में कल्याणकारी क्या है? मैं आपका शिष्य हूं। मुझे मार्ग दिखाइए। मैं आपकी शरण में हूं।” कृष्ण अर्जुन की ओर करुणा और गंभीरता से देखते हैं। श्रीकृष्ण बोले:अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ “अर्जुन, तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जिनके लिए शोक करना उचित नहीं है, और फिर ज्ञान की बातें भी कर रहे हो। ज्ञानी व्यक्ति न जीवित के लिए शोक करता है और न मृत के लिए।” न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥ “ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये सभी राजा नहीं थे। और ऐसा भी नहीं होगा कि आगे हम सभी अस्तित्व में नहीं रहेंगे।” देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ “जिस प्रकार इस शरीर में बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था आती है, उसी प्रकार आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को प्राप्त होती है। धीर पुरुष इस परिवर्तन से मोहित नहीं होता।” मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ “हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी, सुख-दुख—ये सब इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं। ये आते-जाते रहते हैं और स्थायी नहीं हैं। इसलिए इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।” यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ “हे श्रेष्ठ पुरुष! जिसे सुख और दुख विचलित नहीं करते, जो दोनों में समान रहता है, वही अमरत्व के योग्य होता है।” नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ “असत्य का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं और सत्य का कभी विनाश नहीं होता। सत्य को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों ने इस सत्य को समझ लिया है।” अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। वि। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥ “जिस तत्व से यह पूरा संसार व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अविनाशी आत्मा का नाश कोई नहीं कर सकता।” न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ “आत्मा का न कभी जन्म होता है और न मृत्यु। वह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। #भगवद्गीता #भगवतगीता #श्रीमद्भगवद्गीता #श्रीकृष्ण #कृष्ण #अर्जुन #कुरुक्षेत्र #गीता #गीता_सार #कृष्णवाणी #Krishna #BhagavadGita #BhagwatGeeta #GeetaSaar #KrishnaVani #Arjun #Mahabharat #HinduDharma #Spirituality #Motivation #Peace #SanatanDharma