नौ रातें आरंभ: कलश और दीप | नवरात्रि कथा | धर्म कथा EP 67
Dharma Katha धर्म कथा
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नौ रातें आरंभ: कलश और दीप | नवरात्रि कथा | धर्म कथा EP 67
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Dharma Katha धर्म कथा
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माँ आ गई हैं।
कल रात पितर विदा हुए। और आज सुबह, घर-घर में, किसी कोने को झाड़ा गया, धोया गया, और वहाँ एक छोटी सी जगह बनाई गई। माँ के लिए।
धर्म कथा — सीज़न 2: नवरात्रि — एपिसोड 67
स्रोत: Ghatasthapana: living household tradition; muhurat from published almanacs
▶ पूरा सीज़न देखें: • धर्म कथा सीज़न 2: नवरात्रि की कथाएँ (हिंदी)
🎧 पॉडकास्ट पर सुनें: https://rss.com/podcasts/dharma-katha...
पिछला भाग: एपिसोड 66।
स्रोत। श्रेणी: परंपरा। घटस्थापना, जौ बोना, आम के पत्तों और नारियल वाला कलश, और अखंड ज्योति जीवित घरेलू परंपरा हैं, प्रकाशित विवरणों से; प्रदेश और कुल के अनुसार भिन्न हैं। कलश में विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा और मातृगण वाला भाव प्रचलित कलश श्लोक से है, यहाँ केवल भाव दिया है, श्लोक नहीं। ग्यारह अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस की तिथि, और दिल्ली के लिए मुहूर्त, सुबह लगभग छह उन्नीस से दस ग्यारह, और अभिजित लगभग ग्यारह चवालीस से बारह तीस, प्रकाशित पंचांगों से हैं, और शहर के अनुसार बदलते हैं। इस एपिसोड में कोई संस्कृत श्लोक उद्धृत नहीं है।
सूचना: श्लोक प्रकाशित संस्करणों से उद्धृत हैं; उन पर निर्भर होने से पहले किसी संस्कृत विद्वान से जाँच करा लें।
इस कथा का वाचन AI आवाज़ में किया गया है।
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