संविधान में धर्म शब्द क्यों नहीं है?
Ashwini Upadhyay
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संविधान में धर्म शब्द क्यों नहीं है?
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Ashwini Upadhyay
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क्या भारतीय संविधान में धर्म और रिलिजन का अर्थ एक ही है? 🇮🇳 क्या आपने कभी सोचा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदर्श वाक्य "यतो धर्मस्ततो जयः" का वास्तविक अर्थ क्या है? और भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों तथा मौलिक कर्तव्यों की क्या भूमिका है?
इस वीडियो में हम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 19, 21 और 25 के संदर्भ में समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, न्याय और मानवीय गरिमा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करेंगे।
इस वीडियो में जानिए:
🔹 भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का महत्व।
🔹 मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों के बीच अंतर।
🔹 अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता का क्या अर्थ है?
🔹 अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधान क्या हैं?
🔹 धर्म और रिलिजन के बीच अंतर को लेकर प्रस्तुत विचार।
🔹 सुप्रीम कोर्ट के आदर्श वाक्य "यतो धर्मस्ततो जयः" का महत्व।
🔹 संविधान में न्यायपालिका की भूमिका और संविधान की रक्षा का दायित्व।
🔹 समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्व।
🔹 क्या धर्म का संबंध केवल धार्मिक आस्था से है, या कर्तव्य और नैतिकता से भी है?
यह वीडियो भारतीय संविधान, कानून, न्यायपालिका और सामाजिक व्यवस्था को एक नए दृष्टिकोण से समझने का प्रयास है।
आपकी राय क्या है?
क्या धर्म और रिलिजन के बीच अंतर किया जाना चाहिए? क्या भारतीय संविधान में समानता, न्याय और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों को धर्म की व्यापक अवधारणा से जोड़कर देखा जा सकता है?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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इस वीडियो में प्रस्तुत विचार वक्ता के दृष्टिकोण पर आधारित हैं। संवैधानिक प्रावधानों और ऐतिहासिक दावों की व्याख्या के लिए मूल कानूनी एवं ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन करें।
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