अध्याय 5 कर्म संन्यास योग || श्लोक 1~10 || श्लोक और अर्थ हिंदी में || jay shree Krishna ||
Slok Sanhita
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अध्याय 5 कर्म संन्यास योग || श्लोक 1~10 || श्लोक और अर्थ हिंदी में || jay shree Krishna ||
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Slok Sanhita
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भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में निष्काम कर्म का महान उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य का कर्तव्य कर्म करना है, लेकिन उसके फल की आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। कर्मयोग हमें सिखाता है कि ईश्वर को समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करें, क्योंकि यही जीवन में सफलता, शांति और आत्मिक उन्नति का मार्ग है।
🌺॥ जय श्रीकृष्ण ॥🌺
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