लोहावट धरनास्थल बना राजनीतिक अखाड़ा। आखिर लोग क्यों लड़ रहे हैं? Marwar Morcha
Marwar Morcha
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लोहावट धरनास्थल बना राजनीतिक अखाड़ा। आखिर लोग क्यों लड़ रहे हैं? Marwar Morcha
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नमस्कार, मारवाड़ मोर्चा में आपका स्वागत है।
भंवरी देवी बिश्नोई अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके नाम पर चल रहा आंदोलन उन्हें इंसाफ दिलाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या फिर आपसी राजनीति और विवादों में उलझता जा रहा है?
जिस भंवरी देवी के लिए समाज एकजुट हुआ, जिनके न्याय के लिए लोग सड़क पर उतरे, वही धरना स्थल अब आपसी टकराव और विवाद का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
जब मैंने इससे जुड़ा एक वीडियो देखा तो सच में कई सवाल मन में खड़े हो गए।
क्या आपस में लड़कर, एक-दूसरे पर आरोप लगाकर और धरना स्थल को अखाड़ा बनाकर भंवरी देवी को न्याय मिल पाएगा?
पहले आप इस वीडियो को देखिए...
[वीडियो चलाएं]
आपने वीडियो देखा और सुना।
अब सवाल आपसे है—क्या इस तरह की लड़ाई से न्याय की लड़ाई मजबूत होगी या कमजोर?
क्योंकि बात सिर्फ भंवरी देवी की नहीं है।
बात लोहावट की उन महिलाओं की सुरक्षा की भी है, जो आज अपने ही घर की चौखट पर सोते समय डर महसूस कर रही हैं।
हर परिवार के मन में यह सवाल है कि अगर भंवरी देवी के साथ ऐसा हो सकता है, तो कल किसी और परिवार की बेटी, बहन या मां के साथ ऐसा क्यों नहीं हो सकता?
और ऐसे समय में जब समाज को एकजुट होकर सवाल पूछने चाहिए, अगर आंदोलन के मंच पर ही लोग एक-दूसरे से भिड़ने लगें, तो इसका फायदा किसे होगा?
कुछ समय से यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि फलां नेता क्यों नहीं आए?
हनुमान बेनीवाल क्यों नहीं आए?
रविंद्र सिंह भाटी क्यों नहीं आए?
के.के. विश्नोई क्यों नहीं आए?
लेकिन क्या किसी नेता को इस मामले में आवाज उठाने के लिए किसी खास व्यक्ति के न्योते की जरूरत होनी चाहिए?
क्या यह किसी व्यक्ति का निजी मंच है?
क्या किसी ने भंवरी देवी के न्याय की आवाज पर अपना अधिकार या कॉपीराइट ले रखा है?
अगर कोई नेता लोहावट की जनता का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, तो उसे वहां जाकर पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होने के लिए निमंत्रण का इंतजार क्यों करना चाहिए?
मांगीलाल नोखड़ा जी का भी एक वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने इसी बात पर सवाल उठाया कि चाहे बेनीवाल हों, भाटी हों या के.के. विश्नोई—किसी को भी यहां आने के लिए न्योते का इंतजार नहीं करना चाहिए।
और बात बिल्कुल सीधी है।
यह किसी की व्यक्तिगत नेतागिरी का मामला नहीं है।
यह किसी एक नेता की राजनीतिक जमीन मजबूत करने का मामला नहीं है।
यह एक महिला को न्याय दिलाने और लोहावट की महिलाओं की सुरक्षा का सवाल है।
आज जरूरत इस बात की है कि सभी लोग अपने राजनीतिक मतभेदों को पीछे रखकर एक मंच पर आएं।
क्योंकि अगर आंदोलन करने वाले ही आपस में बंट गए, तो सवाल उठेगा कि फिर न्याय की लड़ाई कौन लड़ेगा?
दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
एक महीने का समय बीत जाने के बाद भी अगर परिवार को न्याय का इंतजार करना पड़ रहा है, तो प्रशासन से सवाल पूछना स्वाभाविक है।
एसआईटी गठित कर दी गई।
थानाधिकारी का स्थानांतरण कर दिया गया।
लेकिन सवाल यह है—
क्या सिर्फ एसआईटी बनाने से न्याय मिल जाएगा?
क्या सिर्फ अधिकारी बदलने से मामला खत्म हो जाएगा?
जनता को कार्रवाई चाहिए, नतीजा चाहिए और सबसे जरूरी—सच्चाई चाहिए।
और इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर जो भी सवाल उठ रहे हैं, उनका जवाब जांच के जरिए साफ तौर पर सामने आना चाहिए।
अगर पुलिस के पास सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल, लोकेशन और दूसरे तकनीकी माध्यम हैं, तो फिर जांच में इतनी देरी क्यों?
और अगर किसी अधिकारी पर परिवार को समझौता करने या मामला आपस में सुलझाने का दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं, तो इन आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
क्योंकि एक तरफ अगर पुलिस आरोपी को पकड़ने के लिए इनाम की घोषणा करती है और दूसरी तरफ परिवार किसी कथित दबाव की बात करता है, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में सवाल पैदा होंगे।
इन सवालों का जवाब जरूरी है।
लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि भंवरी देवी के नाम पर चल रही न्याय की लड़ाई आपसी विवाद की भेंट न चढ़े।
क्योंकि अगर धरना स्थल ही आपसी संघर्ष का मैदान बन गया, तो आंदोलन की ताकत कमजोर होगी।
और आंदोलन कमजोर हुआ तो सबसे बड़ा नुकसान किसका होगा?
भंवरी देवी के परिवार का।
और उस हर महिला का, जो आज अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
इसलिए नेताओं से भी सवाल है—
अगर यह मामला राजनीति से ऊपर है, तो फिर एक साथ क्यों नहीं खड़े होते?
धरने पर बैठे लोगों से भी सवाल है—
अगर आप वास्तव में भंवरी देवी को न्याय दिलाना चाहते हैं, तो फिर आपस में क्यों लड़ रहे हैं?
और प्रशासन से सवाल है—
आखिर न्याय कब मिलेगा?
क्योंकि एक बात बिल्कुल साफ है—
भंवरी देवी का नाम किसी की राजनीतिक चमक बढ़ाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
उनकी मौत को राजनीतिक फायदे-नुकसान के तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए।
उन्हें न्याय चाहिए।
उनके परिवार को न्याय चाहिए।
और लोहावट की महिलाओं को यह भरोसा चाहिए कि वे अपने घर में सुरक्षित हैं।
इस लड़ाई में अगर समाज एकजुट रहेगा, नेता राजनीतिक मतभेद भुलाकर एक मंच पर आएंगे और प्रशासन पर निष्पक्ष जांच का दबाव बनाएंगे, तभी इस आंदोलन की आवाज मजबूत होगी।
लेकिन अगर आंदोलन के भीतर ही लोग एक-दूसरे से लड़ते रहे, तो सवाल यही रहेगा—
क्या हम सच में न्याय चाहते हैं, या फिर न्याय के नाम पर अपनी-अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं?
अब आगे क्या होता है?
क्या धरना स्थल पर दोबारा एकजुटता दिखाई देगी?
क्या सभी बड़े नेता इस मुद्दे पर एक मंच पर आएंगे?
क्या पुलिस की जांच में तेजी आएगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
भंवरी देवी को इंसाफ कब मिलेगा?
आप इस पूरे मामले को किस नजरिए से देखते हैं?
क्या धरना स्थल पर हो रही आपसी लड़ाई न्याय की लड़ाई को कमजोर कर रही है?
अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।