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हार की जीत - सुदर्शन

सृजन-विमर्श (बात, साहित्य की...)

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हार की जीत - सुदर्शन

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सृजन-विमर्श (बात, साहित्य की...)
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प्रसिद्ध कथाकार सुदर्शन प्रेमचंद युगीन कथाकार हैं। उनका वास्तविक नाम बद्रीनाथ भट्ट था। सुदर्शन तो उनका तख़ल्लुस अर्थात उपनाम था। सियालकोट में 1896 में जन्मे सुदर्शन की ‘हार की जीत’ कहानी 1920 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह लोकप्रिय आदर्शवादी कहानी दो पात्रों (साधू बाबा भारती और डाकू खड़ग सिंह) के इर्द-गिर्द घुमती है। कहानी मूल्यपरक है और संदेश देती है कि सच्ची जीत ताकत या धोखे से नहीं, बल्कि प्रेम, दया, ईमानदारी और इंसानियत से ही प्राप्त होती है। हृदय-परिवर्तन का सिद्धांत प्रेमचंद ही नहीं सुदर्शन की कहानियों में भी प्रकट हुआ है। ऐसा लगता है जैसे कहानीकार ने डाकू खड़कसिंह को प्राचीनकाल के अँगुलीमार और बाबा भारती को गौतम बुद्ध के प्रतीक रूप पुनर्जीवित किया है। हालाँकि यहाँ बाबा भारती घमंड़ी है और मोहमाया में ग्रस्त दिखता है। जबकि डाकू अपनी प्रवृति के अनुसार छली-धोकेबाज तो है पर कुछ वचन मात्र से ही उसका हृदय द्रवित हो जाता है। सांसारिक विभ्रम मिट जाते हैं और उसका ह्रदय-परिवर्तन हो जाता है। कहानी का शीर्षक “हार की जीत” इसी बात का संकेत लिए है। आप ही बताएं वास्तव में कौन हारा और कौन जीता? ऊपर से हारी बाजी बाबा भारती बड़ी चतुराई से जीतता प्रतीत होता है। पर क्या वास्तव में ऐसा है? वैसे यदि इस कहानी को रूपक की तरह लें तो बाबा परमात्मा का, डाकू आत्मा का और सुलतान संसार का प्रतीक लगता है। और संसार मनुष्य नहीं ईश्वर की विलास-पूर्ति के लिए है!