सुकर्मी मनुष्य एक हैरतअंगेज कहानी
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सुकर्मी मनुष्य एक हैरतअंगेज कहानी
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सुकर्मी मनुष्य
एक दिन महाराज नरवाहन
दत्त महारानी अलंकारवती
के भवन में बैठे हुए थे। उसी
समय उन्होंने बाहर नगाड़ों
की आवाज सुनी। उन्हें आश्चर्य
हुआ और सेनापति हरिशिख
से कहा, “इस समय नगाड़े
क्यों बज रहे हैं ? पता तो लगाओ।”
सेनापति तुरन्त बाहर गए
और कुछ देर बाद लौटकर कहा,
“इस नगरी में रुद् नाम का
एक वैश्य रहता है। व्यापार
करने की इच्छा से वह सुवर्ण
द्वीप गया था। वहाँ उसने
बहुत-सा धन इकट्ठा किया
और फिर वापस लौट पड़ा।
मार्ग में अचानक उसका जहाज़
टूट गया और उसी के साथ
उसकी सारी सम्पत्ति भी नष्ट
हो गई। बेचारा किसी प्रकार
अपने प्राण बचाकर अकेला
ही घर लौटा। अभी छह दिन
पहले ही वह आया था, लेकिन
आज अचानक अपने बाग
में उसे बड़ा भारी खजाना
गड़ा हुआ मिल गया। वह
तुरन्त वत्सराज उद्यन के
पास पहुँचा और सब हाल
बताकर निवेदन किया,
‘महाराज, यह धन उसी का
है इसे आप स्वीकार करें।’
किन्तु प्रसन्नता के कारण वह
वणिक पुत्र नगाड़े बजवा रहा है।
अपने पिता की इस उदारता
और धार्मिकता की कहानी
सुनकर महाराज नरवाहन
दत्त बहुत विस्मित हुए। बोले,
“विधाता क्यों तो किसी का
धन लेता है और क्यों फिर
दुबारा दे देता है।” यह सुनकर
गोमुख ने कहा, “सचमुच
विधाता की लीला बड़ी विचित्र है।
इस सम्बन्ध में मैं आपको
एक और कथा सुनाता हूँ।”
“प्राचीन काल में हर्षपुर
नाम का एक नगर था।
वहाँ हर्षवर्मा नाम का राजा
राज्य करता था। उसके राज्य
में एक बहुत ही कुलीन, धार्मिक
और अत्यन्त धनी वैश्य रहता
था। उसका नाम समुद्रशूर था।
दूर-दूर के द्वीपों में उसका
व्यापार फैला हुआ था।
समय-समय पर वह स्वयं
भी व्यापार करने के लिए
इन द्वीपों में जाया करता था।
एक बार वह व्यापार करने
के लिए सुवर्ण द्वीप की
ओर जा रहा था कि समुद्र
में उसका जहाज़ एक विशाल
मछली से टकरा गया। वह
मछली इतनी ताकतवर थी
कि जहाज़ के टुकड़े-टुकड़े
हो गए। सब कुछ डूब गया।
लेकिन समुद्रशूर तैरना
जानता था, इसीलिए वह
तैरता हुआ किनारे की टोह
में चल पड़ा। तैरते-तैरते उसने
देखा कि एक शव जा रहा है।
वह उसी पर चढ़कर बैठ गया
और धीरे-धीरे किनारे पर
आ लगा। वहाँ आकर उसने
देखा कि उस शव की पीठ
में एक वस्त्र लिपटा हुआ है।
उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।
उसने धोती थी। उसने धोती
को खोलकर देखा तो उसमें
रत्नों की एक कण्ठी जगमगा
रही थी। समुद्रशूर वहाँ से
चल पड़ा और घूमता-घामता
एक नगर में पहुँचा। उस
नगर का नाम कलशपुर था
और उसके बाहर एक
सुन्दर मन्दिर बना हुआ था।
समुद्रशूर बेहद थक गया था।
मन्दिर में बैठते ही उसे नींद
आ गई। वह सो गया। उसी
समय अचानक राज्य के
कुछ सिपाही उधर आ निकले।
उन्होंने सोते हुए समुद्रशूर के
हाथ में वह रत्नकण्ठी देखी।
उसे देखकर वे आपस में चर्चा
करने लगे। एक ने कहा, “अरे,
यह कण्ठी दूसरा और पास
आकर बोला, “अरे कण्ठी तो
राजकुमारी चक्रसेना की है।”
तीसरे ने कहा, “हो न हो,
इसी ने राजकुमारी के गले से
इस कण्ठी को चुराया है।”
चौथा बोला, “तब तो इसे
पकड़कर राजा के पास ले
चलना चाहिए।” उन्होंने
समुद्रशूर को जगाया और उसे
बन्दी बनाकर राजा के पास ले
गए। राजा ने समुद्रशूर से कहा,
“तुम्हें यह कण्ठी कहाँ से
मिली ?” समुद्रशूर ने जो
कुछ उसके साथ बीता था,
सब कह सुनाया। लेकिन
राजा को विश्वास नहीं हुआ।
उसने समस्त सभासदों को
वह कण्ठी दिखाई और कहा,
“यह राजकुमारी चक्रसेना
की कण्ठी है। यह जो कुछ
कहता है, बिल्कुल झूठ है।”
“ठीक इसी समय आकाश
से झपट्टा मारता हुआ एक
गिद्ध वहाँ आया और उस
कण्ठी को छीनकर उड़ गया।
यह देखकर समुद्रशूर बहुत
दुःखी हुआ और वह आर्त
स्वर में भगवान शिव को
पुकारने लगा। राजा बहुत
क्रुद्ध हुआ और उसने आज्ञा
दी कि इस वणिक को मार
दिया जाय। आश्चर्य की
बात, उसी समय आकाशवाणी
हुई, “हे राजन् ! इसे मत मारो।
यह चोर नहीं है। यह हर्षपुर
का रहने वाला व्यापारी
समुद्रशूर है। इसने राजकुमारी
की कण्ठी नहीं चुराई। जिसने
चुराई थी वह राजपुरुषों के
डर से रात को समुद्र में डूबकर
मर गया। उस चोर की पीठ
से इसे यह कण्ठी मिली है।
इस धार्मिक व्यापारी को
धन देकर मुक्त कर यह
आकाशवाणी सुनकर राजा
को बड़ा आश्चर्य हुआ और
उसने समुद्रशूर से क्षमा
माँगते हुए उसे बहुत-सा धन
दिया। धन लेकर समुद्रशूर
अपने देश को लौट चला।
समुद्र पार करने के बाद जब
वह एक वन में पहुँचा तो रात
हो गई। उसके सब साथी सो
गए लेकिन वह जागता रहा।
तभी चोरों ने उनके दल पर
आक्रमण किया, लेकिन
समुद्रशूर चुपचाप पास के
एक बरगद के पेड़ पर चढ़ गया।
सवेरा हुआ तो उसके आश्चर्य
का ठिकाना नहीं था। उसके
सामने गिद्ध का घोंसला था
और उसमें वही रत्नों की
कण्ठी पड़ी हुई थी। समद्रशूर
बहुत प्रसन्न हुआ। सब रत्न
बटोर कर वह नीचे उतरला
और अपने नगर हर्षपुर लौट
आया। उसके बाद वह सुखपूर्वक
रहने लगा। इस प्रकार हे राजन्,
जो सुकर्मी मनुष्य हैं, वे अन्त
में सुख ही पाते हैं।”