Navratri Special Riyaz Session | Aradhana Ke Swar | Raga Jaijaiwanti Part 1 | Guruji Sanjay Dewale
swar sanskar
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Raag Jaijaivanti
Swar Gandhar and Dhaivat Varjya in Aaroh. Both Gandhars. Both Nishads. Rest all Shuddha Swaras.
Jati Audhav - Sampurna Vakra
Thaat Kafi
Vadi - Samvadi Rishabh - Pancham
Time 2nd Prahar of the Night (9PM to 12AM)
Vishranti Sthan S R P N - S' P R;
Mukhya Ang ,D,n R ; R g R S ; ,N S ; R m P N ; n D P;
Aaroh - Avroh S ,D ,n R; R g R S; G m P m G R ; R m P N S' - S' n D P m G R g R S; ,N S ,D ,n R S
Raag Jaijaivanti is a very sweet and touching Raag that has a very wide public appeal. However it is a very complex Raag. There are several combinations that give flashes of various Raags such as R R G R R G m P m G m G R ; ,P R as in Chhaya Raga, G P D n G n n D P D G of Raag Alhaiya , R R m P N N S’ N S’ R’ n D , P D m G ; m G R ,N S of Raag Des and these are intimately merged to give the overall atmosphere of Jaijaivanti.
It should be well remembered that when R G R is with Shuddha Gandhar the Swar yojna must be in Aaroh only, R g R S must be done with Komal Gandhar ie in Avroh, komal Gandhar will be taken between two Rishabhs. Otherwise Shuddha Gandhar will be taken in Avroh if not taken in between two Rishabhs eg : S’ n D P m G R S.Raag Jaijaiwanti Parichay
इस पोस्ट में, हम राग जयजयवंती का परिचय (Raag Jaijaiwanti Parichay) प्रस्तुत करते हैं, जिसमें raag jaijaiwanti bandish, Raag jaijaiwanti Taan, और एक आकर्षक राग जयजयवंती बंदिश (raag jaijaiwanti bandish) “दामिनि दमके डर मोहे लागे” के बारे में भी जानकारी मिलेगी, जो नोटेशन के साथ पूरी होगी।
राग जयजयवंती का परिचय
Raag Jaijaiwanti – राग जयजयवन्ती भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्रसिद्ध राग है, जो खमाज थाट से उत्पन्न माना जाता है। इस राग की प्रकृति गंभीर और कोमल है, और यह रात्रि के द्वितीय प्रहर के अंतिम भाग में गाया-बजाया जाता है।
जयजयवन्ती में दोनों गंधार (शुद्ध और कोमल) और दोनों निषाद (शुद्ध और कोमल) का प्रयोग किया जाता है, जिससे यह राग श्रोताओं को विशेष रूप से प्रभावित करता है। इस राग का वादी स्वर रिषभ और संवादी स्वर पंचम है। राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण है, जिसका अर्थ है कि आरोह और अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है
राग जयजयवंती आरोह अवरोह
आरोह: सा, .ध .नि रे, रे ग म प, नि सां
अवरोह: सां नि ध प, ध ग म रे ग रे सा
पकड़: रे ग रे सा, .नि सा .ध .नि रेRaag Jaijaiwanti Parichay
थाट: खमाज थाट
वादी स्वर: रिषभ (रे)
संवादी स्वर: पंचम (प)
स्वर: रिषभ और निषाद (शुद्ध और कोमल) का प्रयोग किया जाता है,
जाति: सम्पूर्ण – सम्पूर्ण
गायन समय: रात्रि के द्वितीय प्रहर
राग जयजयवन्ती विशेषताएँ
निषाद का प्रयोग: आरोह में पंचम के साथ शुद्ध निषाद और धैवत के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है, जैसे म पनि सां, ध नि रें। अवरोह में सदैव कोमल निषाद का प्रयोग होता है।
गम्भीर प्रकृति: इस राग की प्रकृति गम्भीर है, और इसकी चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होती है। इसमें बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल, ध्रुपद, धमार सभी शोभा देते हैं, लेकिन ठुमरी नहीं गाई जाती।
दो अंगों से गायन: इस राग में दो अंग प्रमुख होते हैं: देश और बागेश्वरी। देश अंग के आरोह में धैवत वर्ज्य कर शुद्ध नि का प्रयोग किया जाता है, जबकि बागेश्वरी अंग में पंचम छोड़कर ध और नि का प्रयोग होता है।
कोमल गंधार का प्रयोग: अवरोह में कोमल गंधार का अल्प प्रयोग दो रिषभों के बीच होता है, जैसे रे ग रे सानि साधनि रे, सा।
प रे संगति: इस राग में प रे की संगति प्रचुर मात्रा में होती है। यहां पर पंचम मंद्र सप्तक का होना चाहिए, जबकि रिषभ तार सप्तक का होना चाहिए।
परमेल-प्रवेशक राग: यह राग रात्रि के द्वितीय प्रहर के अंतिम समय में गाया जाता है और इसके बाद काफी थाट के रागों का समय प्रारम्भ होता है। जयजयवन्ती में खमाज और काफी दोनों थाटों के स्वर लगते हैं, जहां शुद्ध गंधार खमाज थाट का और कोमल गंधार काफी थाट का सूचक है।
समप्रकृति राग
राग देश को जयजयवन्ती का समप्रकृति राग माना जाता है, और दोनों रागों में कई समानताएँ होती हैं। हालांकि, उनकी चलन और प्रकृति में कुछ भिन्नताएँ भी होती हैं।
न्यास के स्वर
जयजयवन्ती में सा, रे, और प स्वर पर विशेष रूप से न्यास किया जाता है। इन स्वरों का राग के आलाप और तानों में प्रमुखता से प्रयोग होता है।
विशेष स्वर-संगतियां
सा, ध नि रे ऽ सा
रे ग म प, ध ग म रे ग रे सा
नि ध प रे ऽ ग रे सा