अभिमन्यु और उत्तरा की अधूरी प्रेम कहानी | चक्रव्यूह का वीर | Mahabharat Story#viral#subscriptions
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सारथी मारा गयाफिर रथ के घोड़े गिरे। कर्ण ने पीछे से आकर उसके धनुष की डोरी काट दी। अभिमन्यु ने तलवार उठाई तो उसे भी टुकड़े कर दिया गया। उसने रथ का पहिया उठाया और उसे ही अस्त्र बनाकर लड़ता रहा।पूरा शरीर बाणों से बिंध चुका था, पर वह झुका नहीं। अंत में दुशासन के पुत्र ने पीछे से गदा का भीषण प्रहार किया। अभिमन्यु ज़मीन पर गिर पड़ा। रक्त से लथपथ, साँसें टूटती हुईंउस वीर बालक की आँखें आसमान की ओर उठीं। उसे उत्तरा का चेहरा याद आया, उसकी आँखों के आँसू और उसका काँपता हाथ। उसके होंठ हिले, बहुत धीमे स्वर में: "उत्तरा... मैं... वापस आऊँगा..." और आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईंकहते हैं उस पल आसमान भी रो पड़ा। युद्ध जीतने की चाहत में कौरवों ने धर्म हार दिया, और पांडवों ने अपना सबसे प्यारा तारा खो दिया।जब अर्जुन को यह खबर मिली तो वे टूट गए। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध करेंगे, नहीं तो अग्नि में समा जाएँगे।और महल में उत्तरा अब भी दीपक जलाए बैठी थी। उसे नहीं पता था कि जिस वचन पर वह जी रही थी, वह अब कभी पूरा नहीं होगा। पर अभिमन्यु का वचन झूठा नहीं गया।उत्तरा के गर्भ में पल रहे पुत्र परीक्षित के रूप में वह लौटा। श्रीकृष्ण ने उसे जीवनदान दिया और वही आगे चलकर पांडव वंश का उत्तराधिकारी बना।अभिमन्यु
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