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Padaa Hu Dar Pe Tere Misle Kaah Ya Zehra | Peer Naseeruddin 'Naseer' RA | Aqeel Warsi Qawwal #fatima

Niyaziya Khanqahi Qawwali

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Padaa Hu Dar Pe Tere Misle Kaah Ya Zehra | Peer Naseeruddin 'Naseer' RA | Aqeel Warsi Qawwal #fatima

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Niyaziya Khanqahi Qawwali
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पड़ा हूं दर पे तेरे मिस्ले काह या ज़हरा मिले फ़क़ीर को ख़ैराते जाह या ज़हरा हैं मुर्तज़ा तेरे शौहर तो मुस्तफ़ा बाबा ज़हे ये औजो शरफ़ इज़्ज़ो जाह या ज़हरा मिले जो इसकी इजाज़त मुझे शरीयत से तो तेरा दर हो मेरी सजदागाह या ज़हरा ख़ुदा को मैंने सदा लाशरीक माना है ख़ुदा के सामने रहना गवाह या ज़हरा हैं जिनके नूर से उम्मत के रोज़ो शब रौशन हसन हुसैन तेरे मेहरो माह या ज़हरा हसन हुसैन का किरदार देख कर अब तक पुकारते हैं मलक वाह वाह या ज़हरा दुरूद तुझ पे हो मिस्दाक़े बज़अतुम मिन्नी सलाम तुझ पे हो गीती पनाह या ज़हरा हैं तेरी आल से पीराने पीर मुहियुद्दीन जो औलिया के हुए सरबराह या ज़हरा भरूं तो कैसे भरूं दम तेरी ग़ुलामी का बहुत बड़ी है तेरी बारगाह या ज़हरा कहाँ तू एक नजीबा अफ़ीफ़ा पाक नज़र कहाँ मैं एक असीरे गुनाह या ज़हरा तू बादशाहे दो आलम की एक शहज़ादी मैं इक ग़रीब तेरी गर्दे राह या ज़हरा उजड़ चुका हूँ ग़मे ज़िंदगी के हाथों से खड़ा हूँ दर पे बहाले तबाह या ज़हरा हूँ मआसियत की सियाही मले हुए मुँह पर किसे दिखाऊँ ये रु ए सियाह या ज़हरा मैं गो बुरा हूँ मगर तेरा वो घराना है किया बुरों से भी जिसने निबाह या ज़हरा भरी हैं दर से हज़ारों ने झोलियाँ अपनी मेरी तरफ़ भी करम की निगाह या ज़हरा न फेर आज मुझे अपने दर से तू ख़ाली के तेरे बाबा हैं शाहों के शाह या ज़हरा जिऊँ तो ले के जिऊँ तेरी दौलते निस्बत मरूँ तो ले के मरूँ तेरी चाह या ज़हरा बरोज़े हश्र न पुर्सा हो जब कोई उसका मिले 'नसीर' को तेरी पनाह या ज़हरा कलाम: हज़रत पीर नसीरुद्दीन 'नसीर' गोलड़वी रअ پڑا ہوں در پہ تیرے مثلِ کاہ یا زہرا٤ ملے فقیر کو خیراتِ جاہ یا زہرا٤ ہیں مرتضیٰ تیرے شوہر تو مصطفیٰ بابا زہے یہ اوج و شرف عز و جاہ یا زہرا٤ ملے جو اس کی اجازت مجھے شریعت سے تو تیرا در ہو میری سجدہ گاہ یا زہرا٤ خدا کو میں نے سدا لاشریک مانا ہے خدا کے سامنے رہنا گواہ یا زہرا٤ ہیں جنکے نور سے اُمّت کے روز و شب روشن حسن٤ حسین٤ تیرے مہر و ماہ یا زہرا تیرے حسین٤ کا کردار دیکھ کر اب تک پکارتے ہیں ملک واہ واہ یا زہرا٤ درود تجھ پہ ہو مصداقِ بضعۃ منی سلام تجھ پہ ہو گیتی پناہ یا زہرا٤ ہیں تیری آل سے پیرانِ پیر محی الدین جو اولیاء کے ہوئے سربراہ یا زہرا٤ بھروں تو کیسے بھروں دم تیری غلامی کا بہت بڑی ہے تیری بارگاہ یا زہرا٤ کہاں تو ایک نجیبہ عفیفہ پاک نظر کہاں میں ایک اسیرِ گناہ یا زہرا٤ تو بادشاہِ دو عالم کی ایک شہزادی میں اک غریب تیری گردِ راہ یا زہرا٤ اُجڑ چکا ہوں غمِ زندگی کے ہاتھوں سے کھڑا ہوں در پہ بحالِ تباہ یا زہرا٤ ہوں معصیت کی سیاہی ملے ہوئے منہ پر کسے دکھاؤں یہ روئے سیاہ یا زہرا٤ میں گو بُرا ہوں مگر تیرا وہ گھرانہ ہے کیا بُروں سے بھی جس نے نباہ یا زہرا٤ بھری ہیں در سے ہزاروں نے جھولیاں اپنی میری طرف بھی کرم کی نگاہ یا زہرا٤ نہ پھیر آج مجھے اپنے در سے تو خالی کہ تیرے بابا ہیں شاہوں کے شاہ یا زہرا٤ جیوں تو لے کے جیوں تیری دولتِ نسبت مروں تو لے کے مروں تیری چاہ یا زہرا٤ بروزِ حشر نہ پرسہ ہو جب کوئی اُس کا ملے 'نصیر' کو تیری پناہ یا زہرا٤ کلام: حضرت پیر نصیرالدین 'نصیر' گولڑوی رض