Speech on Mahatma Gandhi & Lal Bahadur Shastri
Shivlearners1996
0:00 / 0:00
Speech on Mahatma Gandhi & Lal Bahadur Shastri
138 просмотров · 8 дней назад
Shivlearners1996
100 подписчиков
138 просмотров · 8 дней назад
Mahatma Gandhi का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में हुआ। गांधी आधुनिक राजनीतिक चिंतन में इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने राजनीति को नैतिकता, सत्य, अहिंसा और मानव कल्याण से जोड़ने का प्रयास किया।
गांधी के लिए राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि व्यक्ति और समाज के नैतिक उत्थान का साधन थी।
उनके चिंतन का मूल संबंध इन प्रश्नों से है—
सत्य क्या है? व्यक्ति अन्याय का विरोध कैसे करे? हिंसा के बिना राजनीतिक परिवर्तन कैसे संभव है? स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ क्या है? और राज्य तथा समाज का उद्देश्य क्या होना चाहिए?
गांधी के राजनीतिक दर्शन की मूल आधार-श्रृंखला :
सत्य → अहिंसा → सत्याग्रह → स्वराज → सर्वोदय → रामराज्य
अर्थात् सत्य गांधी के चिंतन का आध्यात्मिक आधार है, अहिंसा उसका साधन है, सत्याग्रह उसका राजनीतिक प्रयोग है और स्वराज तथा सर्वोदय उसके सामाजिक-राजनीतिक लक्ष्य हैं।
सत्य (Truth)
गांधी के दर्शन में सत्य सर्वोच्च नैतिक सिद्धांत है।प्रारंभ में गांधी का प्रसिद्ध सूत्र था:“ईश्वर सत्य है।”
बाद में उनके चिंतन में यह सूत्र विकसित होकर हुआ—“सत्य ही ईश्वर है।”इस परिवर्तन का अर्थ यह है कि गांधी के लिए सत्य किसी एक धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं था। सत्य को उन्होंने सार्वभौमिक नैतिक मूल्य माना।गांधी के लिए सत्य का अर्थसत्य बोलनासत्य का अनुसरण करनाअपने कार्यों में ईमानदारी रखनाअन्याय के सामने सत्य के पक्ष में खड़ा होनाअपने विचारों की सीमाओं को स्वीकार करनागांधी स्वयं अपने विचारों को अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं मानते थे। इसलिए उनकी आत्मकथा का नाम है—“सत्य के साथ मेरे प्रयोग” (My Experiments with Truth)
अहिंसा (Non-Violence)
गांधी के राजनीतिक दर्शन की दूसरी केंद्रीय अवधारणा अहिंसा है।
सामान्य अर्थ में अहिंसा को केवल हिंसा न करने के रूप में समझा जाता है, लेकिन गांधी के लिए इसका अर्थ इससे व्यापक था।
गांधी की अहिंसा में शामिल हैं:
किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति न पहुँचाना
घृणा से बचना
प्रतिद्वंद्वी के प्रति भी मानवता बनाए रखना
अन्याय का विरोध करना, लेकिन व्यक्ति से घृणा न करना
प्रेम और करुणा को राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाना
गांधी के अनुसार अहिंसा निष्क्रियता नहीं, बल्कि सक्रिय नैतिक शक्ति है।
महत्वपूर्ण सूत्र :
अहिंसा कायरता नहीं है।
गांधी के अनुसार सच्ची अहिंसा के लिए साहस, आत्मसंयम और त्याग की आवश्यकता होती है।
सत्याग्रह (Satyagraha)
यह गांधी के राजनीतिक दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है।
सत्य + आग्रह = सत्याग्रह
अर्थात् सत्य के प्रति दृढ़ आग्रह।
सत्याग्रह का उद्देश्य विरोधी को नष्ट करना नहीं, बल्कि उसके हृदय और विवेक को बदलना है।
सत्याग्रह के प्रमुख तत्व :
सत्य, अहिंसा, आत्मबल, आत्मसंयम, त्याग, कष्ट सहने की क्षमता, अन्याय का प्रतिरोध, विरोधी के प्रति घृणा का अभाव
लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। वे अपनी सादगी, ईमानदारी, विनम्रता, दृढ़ नेतृत्व और राष्ट्रसेवा के लिए प्रसिद्ध हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने काशी विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की और 1926 में ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम का प्रयोग छोड़कर केवल ‘शास्त्री’ नाम अपनाया।
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया, जिनमें प्रमुख हैं:
असहयोग आंदोलन
सविनय अवज्ञा आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
स्वतंत्रता के बाद शास्त्री ने प्रशासन और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं। उन्होंने:
• उत्तर प्रदेश सरकार में पुलिस एवं परिवहन मंत्री के रूप में कार्य किया।
• केंद्र में रेल एवं परिवहन मंत्री रहे। बाद में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री तथा गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले।
रेल मंत्री के रूप में एक बड़ी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दिया। यह घटना उनके सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही के उदाहरण के रूप में अक्सर उद्धृत की जाती है।
27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल लगभग 18 महीने रहा—
जून 1964 से जनवरी 1966 तक।
उनके सामने प्रमुख चुनौतियाँ थीं:
खाद्य संकट, आर्थिक कठिनाइयाँ, कृषि उत्पादन बढ़ाना, राष्ट्रीय सुरक्षा, पाकिस्तान के साथ तनाव
शास्त्री जी का सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय आह्वान था:
“जय जवान, जय किसान।”
इसका उद्देश्य देश की सुरक्षा में सैनिकों और खाद्य सुरक्षा में किसानों के योगदान को समान महत्व देना था।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान यह नारा राष्ट्रीय एकता और मनोबल से विशेष रूप से जुड़ा।
युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने के लिए सोवियत संघ की मध्यस्थता में ताशकंद सम्मेलन हुआ।
10 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ। वे ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही समय बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।
उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे भारत के पहले मरणोपरांत भारत रत्न प्राप्तकर्ताओं में से एक थे।
शास्त्री जी के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं:
सादगी → ईमानदारी → अनुशासन → कर्तव्यनिष्ठा → जवाबदेही → राष्ट्रसेवा
उनका जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत सादगी और सार्वजनिक जिम्मेदारी का महत्व कितना बड़ा है।