अम्बा जी शक्तिपीठ मंदिर गिरनार | गिरनार पर्वत | जूनागढ़ गुजरात | 4K | दर्शन 🙏
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अम्बा जी शक्तिपीठ मंदिर गिरनार | गिरनार पर्वत | जूनागढ़ गुजरात | 4K | दर्शन 🙏
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श्रेय:
लेखक: रमन द्विवेदी
भक्तों नमस्कार! प्रणाम और हार्दिक अभिनन्दन! भक्तों आज हम आपको जिस धाम की यात्रा करवाने जा रहे हैं, वह देश और दुनिया में गिरनार के नाम से प्रसिद्ध है. जहाँ कई देवी देवताओं के प्रख्यात मंदिरों के अलावा देवी के 51 शक्तिपीठों में से प्रमुख शक्तिपीठ, प्रभास चन्द्रभागा शक्तिपीठ भी है. यह शक्तिपीठ माता सती का उदर गिरने से बना है. यहाँ माँ जगत्जननी अम्बा जी के रूप में विराजमान है.
गिरनार के बारे में:
भक्तों गिरनार गुजरात और राजस्थान की सीमा में अरावली पर्वत श्रेणी के मध्य गिरनार पर्वत पर स्थित है. जो गुजरात के बनासकांठा जिले के जूनागढ़ नामक स्थान में है. जूनागढ़ से गिरनार की दूरी 5 किलोमीटर है. यह स्थान पृथ्वी सतह से 3861 फीट ऊंचे पर्वत शिखर पर है. इसके सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने के लिए 9999 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
गिरनार नाम क्यों:
भक्तों इस पर्वत के गिरनार नाम के पीछे एक लोककथा प्रसिद्ध है जिसके अनुसार- भगवान विष्णु ने इस गिरि यानि पर्वत को वरदान देते हुए कहा था कि तुम्हारे पास सभी देवी देवता निवास करेंगे और संसार में तुम्हारी प्रसिद्धि “गिरि नारायण” के नाम से होगी. कालांतर गिरि नारायण का अपभ्रंश नाम गिरनार हो गया।
गिरनार के प्रमुख मंदिर:
भक्तों यों तो गिरनार में दर्जनों मंदिर हैं किन्तु चार मंदिर प्रमुख हैं 4 पर्वत शिखरों के नाम से प्रसिद्ध हैं. पहला शिखर जैन मंदिर शिखर 4000 सीढ़ियों पर, दूसरा अम्बा जी शिखर 5000 सीढ़ियों पर, तीसरा गोरखनाथ शिखर 5800 सीढ़ियों पर और चौथा भगवान दत्तात्रेय शिखर 9999 सीढ़ियों पर स्थित है। इन चारों मंदिर शिखरों की बड़ी महिमा है किन्तु अम्बा जी मंदिर की लोकप्रियता और प्रसिद्धि सबसे अधिक है
पौराणिक कथा:
भक्तों पौराणिक कथा के अनुसार- दक्ष प्रजापति माता सती के पिता और भगवान शिव के ससुर थे, एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया। जिसमे उन्होंने भगवान् शिव और माता सती को नही बुलाया क्योंकि वो भगवान शिव को अपने बराबर का नही समझते थे। यह बात माता सती को काफी बुरी लगी और वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गईं। यज्ञशाला में भगवान शिव का काफी अपमान किया गया, जिसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कूद गयीं। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वो आए और माता सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिससे सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागो में बांट दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंगों के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। मान्यता है कि गिरनार के प्रभास चंद्रभागा शक्तिपीठ अम्बाजी में माता सती का उदर गिरा था।
मंदिर से सम्बद्ध पौराणिक कथाएँ:
भक्तों गिरनार अंबाजी मंदिर से सम्बद्ध कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं एक कथा के अनुसार- त्रेता युग में अपने वनवास काल में भगवान श्रीराम, माता सीता और भैया लक्ष्मण के साथ जब गोदावरी नदी के तट पर पंचवटी में निवास कर रहे थे. तब लंकापति रावण ने छल करते हुए दुष्टतापूर्वक माता सीता का अपहरण कर लिया था. भगवान श्रीराम और लक्ष्मण, माता सीता की खोज करते हुए अर्बुदा पर्वत यानि माउंट आबू आए थे। तब उन्होंने श्रृंगी ऋषि के सलाह पर गब्बर शिखर पर अम्बा जी को प्रसन्न करने के लिए शक्ति साधना की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर जगतजननी देवी अम्बा जी ने उन्हें एक दिव्य अजेय बाण प्रदान किया था. जिससे भगवान राम ने रावण का वध किया किया था।
भक्तों दूसरी कथा के अनुसार- द्वापर युग में गिरनार के गब्बर शिखर पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था.
भक्तों अम्बा जी से जुड़ी तीसरी कथा के अनुसार- महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने अपने निर्वासन के दौरान यहाँ आकर अंबाजी की आराधना की थी। पांडवों की आराधना से अम्बा जी अत्यधिक प्रसन्न हुईं. उन्होंने पांडवों के गले में विजयमाल पहनाते हुए, युधिष्ठिर को कंक ब्राह्मण, भीम को बल्लव रसोइया, अर्जुन को वृहन्नला नृत्य शिक्षक, नकुल को ग्रंथिक घोड़ों का सेवक और सहदेव को तंतिपाल ग्वाला बनकर राजा विराट के यहाँ रहने की आज्ञा दी और आगामी युद्ध में अजेय रहने का वरदान दिया था .
भक्तों एक अन्य कथा के अनुसार- विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने हेतु यहां आकर अंबाजी की पूजा अर्चना की थी. अम्बा जी ने रुक्मिणी जी को भगवान श्रीकृष्ण को प्रेमपत्र लिखने की आज्ञा दी। परिणाम स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी का विवाह संभव हुआ था.
मंदिर का इतिहास:
भक्तों अम्बा जी मंदिर के स्थापत्य काल का न तो समय स्पष्ट है और ना ही कोई प्रमाण है. अतः अम्बा जी के मंदिर की स्थापना को लेकर लोगों के कई मत हैं. कुछ लोग इस मंदिर को भगवान श्रीकृष्ण के समय का, कुछ लोग इसे गौतम बुद्ध के समय का, कुछ समुद्रगुप्त के समय का और कुछ लोग इसे 12 सौ वर्ष प्राचीन मंदिर मानते हैं. इसलिए अम्बा जी मंदिर के निर्माण समय का आकलन कठिन ही नहीं असंभव भी है.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि तिलक किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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