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श्रीमद्भगवद्गीता – षष्ठम अध्याय (आत्मसंयम योग ) – शलोक 28 📿 📜🦚🙏 📖🕉️

Praveen Gururani

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श्रीमद्भगवद्गीता – षष्ठम अध्याय (आत्मसंयम योग ) – शलोक 28 📿 📜🦚🙏 📖🕉️

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Praveen Gururani
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८॥ 🌿 सरल हिंदी अर्थ जो योगी इस प्रकार निरंतर अपने मन को परमात्मा में लगाए रखता है और जिसके सभी पाप नष्ट हो चुके हैं, वह सहज रूप से ब्रह्म के स्पर्श से प्राप्त होने वाले अत्यंत आनंद का अनुभव करता है। 🕉️ भावार्थ श्रीकृष्ण बताते हैं कि निरंतर योगाभ्यास और आत्मसंयम से साधक का मन शुद्ध होता जाता है। जब मन सांसारिक आसक्तियों और विकारों से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाता है, तब उसे ब्रह्मानंद का अनुभव होता है। यह आनंद बाहरी वस्तुओं से मिलने वाले सुख से अलग है। यह भीतर से उत्पन्न होने वाला अत्यंत गहरा और स्थायी आनंद है। 🌸 मुख्य संदेश निरंतर योगाभ्यास और शुद्ध मन के द्वारा साधक परमात्मा के सान्निध्य से मिलने वाले परम आनंद को प्राप्त करता है।