भारत का सातवां आश्चर्य वारंगल का किला – कोइतूरों की अनमोल विरासत ,( Warangal Fort) Dr Suraj Dhurvey.
The Koitoor Times
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भारत का सातवां आश्चर्य वारंगल का किला – कोइतूरों की अनमोल विरासत ,( Warangal Fort) Dr Suraj Dhurvey.
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दक्षिण भारत के काकतीय वंश और उनके इतिहास के बारे में आप लोगों ने जरूर पढ़ा या सुना होगा लेकिन काकतीय इस देश में मूलनिवासी कोइतूर थे यह बात शायद आप लोगों ने न तो सुनी होगी और न ही पढ़ी होगी। दक्षिण भारत के तेलंगाना, आँध्रप्रदेश और तमिलनाडु के ज्यादातर हिस्सों पर कभी काकतीय वंश के कोइतूर राजाओं का वर्चस्व रहा है जिन्होंने यादव वंश और चालुक्य वंश के राजाओं को हराकर यह साम्राज्य स्थापित किया था। वारंगल जिले में वारंगल शहर के दक्षिणी पूर्वी भाग में तीन दीवारों से सुरक्षित काकतीय राजाओं के प्राचीन किले के अवशेषों को आज भी देखा जा सकता है।
800 वर्षों से ज्यादा समय के बाद भी इस साम्राज्य के वैभव, समृद्ध और उन्नति को इसके किले, महलों, मंदिरों इत्यादि के खंडहरों में साफ़ साफ़ देखा जा सकता है। इस वीडियो में बहुत विस्तार से इस इस राजवंश की शासन व्यवस्था और उसके सम्राज्य के बारे में बताया गया है। तीन सुरक्षा दीवारों से घिरे इस किले में आज भी इसके राजमहल के खँडहर और अवशेष सीना ताने अपना इतिहास बयां कर रहे हैं। लाख षणयंत्रों और जान बूझ कर किये गए परिवर्तनों के बावजूद भी कोइतूरों के राजवंश की निशानियाँ आज भी इस राजमहल में देखी जा सकती हैं। इसे काकतीय कला तोरणम के नाम से जाना और पहचाना जाता है। कहने को तो आज के इतिहासकार और लेखक इसे मंदिर बताते हैं लेकिन राजमहल होने के प्रमाण ज्यादा है। इतने बड़ा किला क्या मंदिर की सुरक्षा के लिए बनाया गया होगा? अगर यह मंदिर है तो फिर किले के अन्दर का राजमहल कहाँ गया? आज वारंगल के किले के अनादर जिस खंडहर को लोग मंदिर के नाम से लिखते पढ़ते और प्रचार करते हैं वास्तव में वह कोइतूरों के महान सम्राट रुद्रदेव, महादेव, गणपति देव, रानी रूद्रमा देवी और प्रतापरुद्र जैसे महान कोइतूर राजाओं और रानियों का राजमहल है।
गोंडवाना और कोइतूरों के राजचिन्ह का प्रतीक “हाथी पर सवार शेर”(गज सुडूम) चीख चीख कर कोइतूरों की राजधानी होने का प्रमाण दे रहा है। इस राजचिन्ह के प्रति घृणा, नफरत और वैमनस्य साफ़ साफ़ देखा जा सकता है क्यूंकि हर जगह हाथी पर सवार शेर के राजचिन्ह को बुरी तरह से खंडित किया गया है। जगह जगह हाथी और शेर की टूटी हुई प्रतिमाएं और मूर्तियाँ मिलती हैं और ख़ास बात इनको एक दूसरे से अलग अलग रख कर इस राजचिन्ह को दुनिया की नज़रों से बचने का प्रयाश भी साफ़ साफ़ दिख रहा है। कहते हैं कि सत्य को कितना भी छुपाओ वह किसी न किसी रूप में दुनिया के सामने आ ही जाता है। यद्यपि राज चिन्ह के शेर के नीचे से हाथियों को बड़ी सफाई से काटकर या तोड़कर अलग कर दिया गया है लेकिन आज भी एक शिला पट्ट पर कई हाथी पर सवार शेर – राजचिन्ह, अभी भी देखे जा सकते हैं। तो आइये आज इसी रहस्य से पर्दा उठाते हैं और कोइतूरों की इस महान विरासत में किये जा रहे परिवर्तनों को समझने के कोशिश करते हैं।
वारंगल का किला अपने अन्य कई विशेषताओं के लिए भी जाना जाता है जैसे दुनिया का प्रसिद्द हीरा “कोहिनूर” इसी काकतीय राजवंश का था जिसे दिल्ली के सुल्तानों ने लूटा था। मुगलों, पठानों, सरदारों और अंग्रेजों से होता हुआ महारानी विक्टोरिया तक पहुंचा था। बस्तर का प्रसिद्द काकतीय राजवंश इसी वंश की एक शाखा था जो बस्तर में 635 वर्षों तक राज्य किया। दिल्ली सल्तनत ने काकतीय साम्राज्य के धन दौलत, सोने चांदी, हीरे जवाहरात से भरे खजाने को पूरी तरह लूट कर बर्बाद कर दिया था।
दिल्ली सल्तनत के बाद आने वाले मुगलों और अंग्रेजों ने भी इसके निशानों को मिटाने का क्रम जारी रखा और कभी भी इस वंश की असली सच्चाई को दुनिया के सामने आने नहीं दिया। आशा कर हूँ कि यह वीडियो आपको सोचने पर मजबूर करेगा और आपके दिमाग में यह प्रश्न उठाने पर मजबूर करेगा कि हाथी पर सवार शेर की इस किले में उपस्थिति को क्यूँ छुपाया जा रहा है ?
डॉ सूरज धुर्वे