मन में निरंतर चल रही प्रक्रिया मन को अशांत बनाती है
Chinmay Mandavgane
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मन में निरंतर चल रही प्रक्रिया मन को अशांत बनाती है
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Chinmay Mandavgane
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अगर हम अपने मन की ओर ध्यान दें, तो हम पाएँगे कि मन में एक प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। भीतर एक शोर है, जो हमेशा बना रहता है; वह कभी शाँत नहीं होता। एक हलचल है, जो थमती नहीं है। सो जाने पर भी वह प्रक्रिया सपनों के रूप में जारी रहती है। यह शोर क्या है? निरंतर उठ रहे विचारों, भावनाओं और तस्वीरों की उथल-पुथल का कारण क्या है? यह जो गति मन में बनी हुई है, क्या यही वह अशांति नहीं है, जो हमें भीतर महसूस होती है, जिसकी वजह से हम अपने आप को असहज पाते हैं? कभी हमें लगता है कि हम अपनी मर्ज़ी से किसी गहरे सोच-विचार में डूबे हुए हैं, तो कभी खयालों की उधेड़बुन बिना हमारी मर्ज़ी के भीतर सक्रिय रहती है। हमें होश भी नहीं होता कि हमारे मन में क्या चल रहा है।
जब हम अपने आप को तमाम तरह की चीज़ों के बीच व्यस्त नहीं पाते, तब बेचैनी और बढ़ जाती है। मन के किसी अचेतन तल पर चल रही एक प्रक्रिया, व्यस्त न रहने पर, और गहन हो जाती है। जो अंदर कहीं दबा हुआ था, वह सतह पर आ जाता है। हम जाने-अनजाने बाहरी चीज़ों में बँधे रहकर अपने आप को आंतरिक तल पर शांत रखने की कोशिश करते हैं। अगर हम बाहरी किसी काम में व्यस्त नहीं हैं, तो हम अपनी चिंताओं में व्यस्त रहते हैं। व्यस्तता हमारे लिए ज़रूरी हो जाती है, क्योंकि वह अशांत मन को शांत करने का काम करती है। मगर यह शांति कृत्रिम है। एक भटके हुए, छितराए मन को किसी वस्तु या विषय के साथ रहने पर जो स्थिरता महसूस होती है, वह बनावटी है। उसका असर सिर्फ़ कुछ समय तक रहता है और मन फिर बेचैन और अस्थिर हो जाता है। अगर हम अपने आप को चिंतित पाते हैं, तो मन वास्तव में चिंता के द्वारा स्वयं को शांत रखने का प्रयास कर रहा है। चिंता करने पर मन को अपने होने की अनुभूति होती है।
एक दैनिक ढर्रे का होना मन को सुरक्षा देता है, उसे व्यवस्थित रखता है। हमारी जीवन-शैली में व्यस्तता कहीं न कहीं इसीलिए मौजूद है, क्योंकि वह मन को एक लय देती है। हम अलग-अलग तरह के खिलौनों के माध्यम से मन को भटकाते हैं। खिलौना महज़ वह वस्तु नहीं है, जिसमें एक छोटा बच्चा अपने आप को खो देता है। हर वह चीज़, जिसके प्रति हम अपने आप को आकर्षित होता हुआ पाते हैं, जिसकी उपस्थिति में व्यक्ति स्वयं को किसी न किसी रूप से स्थिर पाता है, एक खिलौना है। मोबाइल फोन, मंत्रोच्चारण, शराब—ये सब वे चीज़ें हैं, जिनमें हम डूबकर अपने आपको खो देना चाहते हैं। क्या बिना किसी ढर्रे, व्यवस्था या खिलौने का इस्तेमाल किए मन की बेचैनी को सीधा संबोधित किया जा सकता है? मन शांत होने के लिए जिस व्यवस्था से जुड़ता है, वह जाने-अनजाने उसी का ही ग़ुलाम बन जाता है। धार्मिक, पारिवारिक, व्यवसायिक—ये सारी व्यवस्थाएँ मन को एक पहचान और अस्तित्व देती हैं। बिना इनके मन अपने आप को खोया हुआ और अस्थिर पाता है।
किसी व्यवस्था या ढर्रे की अनुपस्थिति में मन को एक अस्तित्वगत बेचैनी महसूस होती है। इस बेचैनी से पलायन ही मन को ग़ुलाम बनाए रखता है। हम जिस व्यवस्था में कैद होते हैं, वही हमारी सीमा बन जाती है। क्या मन अपनी ओर देख सकता है? क्या मन अपनी प्रवृत्तियों को जान सकता है? भीतर जो सारी मानसिक सामग्री मौजूद है, वही हमारी बेचैनी का कारण है। हम बाहरी दिशा में सुरक्षा खोजते हैं और भीतरी जगत के प्रति पूरी तरह से अनभिज्ञ रहते हैं। मन के द्वारा इकट्ठा किए गए सुरक्षा के सभी विषय व्यर्थ हैं। हमें लगता है कि हमारी समस्या कहीं बाहर है, लेकिन वास्तव में हमने भीतर जो सारी संपत्ति इकट्ठा कर ली है, वह संपत्ति ही हमारी समस्या है। जब मन अपने आप को समझता है, वह समझने की उस प्रक्रिया में ही शांत होता है। आत्म परीक्षण, सजगता, अपने विचारों और भावनाओं के प्रति ग़ौर करना—मन में एक सहजता लाता है। स्थिरता किसी विषय की उपस्थिति मैं नहीं है; वह मन के क़रीब आने का एक स्वाभाविक परिणाम है।
जीवन अन्वेषण, 04.03.2025
Chapters:
00:00 Intro
00:11 मन में निरंतर चलती एक प्रक्रिया
03:17 हम अपनी चिंताओं में व्यस्त रहते हैं
07:09 मन बिना किसी ढर्रे के विचलित और छितराया हुआ रहता है
14:48 मन एक व्यवस्था का ग़ुलाम बन जाता है
18:03 क्या मन अपने आप को देख सकता है?
25:08 मन अपनी प्रवृत्तियों से अनजान है / मन अपने आप को समझने की प्रक्रिया में ही शाँत होता है