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Proud Moment for the studio UK13 Team || Pataal Tee Short Film || Rudraprayag || Uttarakhand ||

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Proud Moment for the studio UK13 Team || Pataal Tee Short Film || Rudraprayag || Uttarakhand ||

17 835 просмотров · 4 г. назад
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#nationalawardwinne #bestcinematography Location Hunting Tour (Niti Valley ):    • Location Hunting Tour (Niti Valley )   बुसान के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल में चयन के बाद 'पताल ती' के प्रतिष्ठित फिल्म फेयर पुरस्कार ऑस्कर के लिए नामित होने की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। अगर ये फिल्म टॉप 14 में से टॉप एक में आती है तो यह ऑस्कर के लिए जाएगी। यह फिल्म भोटिया जनजाति की लोक कथा पर आधारित है जिसमें एक किशोर पोता अपने मरणासन दादा की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए भूत और भौतिक के बीच की दूरी को नापता है। प्रकृति और जीवन के बीच संघर्ष इस फिल्म को मानवीय रूप से भी संवेदनशील व भावपूर्ण बना देता है। बिट्टू रावत व दिव्यांशु रौतेला ने किया है फिल्म में प्राकृतिक रोशनी का बेहतरीन उपयोग किया गया है। साथ ही कलाकारों के नाममात्र संवाद ने भी इसे खास बनाया है। फिल्म में आयुष रावत धन सिंह राणा, कमला कुंवर, भगत बुरफाल ने मुख्य भूमिका निभाई है। फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गजेंद्र रौतेला व सत्यार्थ प्रकाश शर्मा हैं।  फिल्मांकन बिट्टू रावत व दिव्यांशु रौतेला ने किया है। फिल्म निर्माण के लिए व्यवस्थाएं जुटाने में गोरणा निवासी रजत बर्त्वाल ने अहम भूमिका निभाई है। निर्देशक संतोष सिंह रावत और एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गजेंद्र रौतेला बताते हैं कि पताल ती लघु फिल्म ने लोक भाषा के साथ कला को नई पहचान देने का काम किया है। साथ ही नए कलाकारों की प्रतिभा को मंच देने में अहम रोल अदा किया है। आने वाले समय में उत्तराखंड में फिल्म निर्माण की दिशा में भी नए मौके मिलेंगे। अंतरराष्ट्रीय फिल्म मेकर का मिला सहयोग उत्तराखंड की लघु फिल्म पताल ती को संजोने में हालीवुड फिल्मनिर्माण से जुड़े लोगों का भरपूर सहयोग मिला। इस फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में ध्वनि संयोजन ऑस्कर विजेता रेसुल पुकुट्टी (स्लम डॉग मिलेनियर), एडिटिंग का काम संयुक्ता काजा (तुम्बाड़ वेब सीरीज) और पूजा पिल्लै (पाताल लोक) और रंग संयोजन में ईरान के हामिद रेजाफातोरिचअन ने सहयोग किया है। इन फिल्म फेस्टिवल में मिलेगा स्वत : प्रवेश उत्तराखंड की लघु फिल्म पताल ती के बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में शामिल हो गई है। अब फिल्म को प्रेमिओस गोया (अकादमी ऑफ पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज ऑफ स्पेन), कैनेडिन स्क्रीन अवार्ड, बाफ्टा (ब्रिटिश अकादमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आटर्स), अकादमी अवार्ड, ऑस्कर्स (अकादमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज) में भी प्रवेश मिल जाएगा। अक्सर फिल्में और समाज एक दूसरे को आइना दिखाते हैं। फिल्मों का प्रभाव समाज पर भी होता है तो समाज का फिल्मों पर भी। फिल्में हमारे समाज की बात को बेहद प्रभावी और कलात्मक ढंग से प्रस्तुत भी करती हैं। जब फिल्में समाज के बीच एक विमर्श और संदेश को देने में सफल होती हैं तो ये कला से ज्यादा ‘भाषा’ का काम करती हैं। आज के दौर में कई प्रकार की फिल्में हमारे बीच आ रही हैं। जिनमें ‘short film’ के प्रकार ने बहुत तेजी से अपनी एक बड़ी जगह बनाई है। तकनीक के प्रभाव और तेज गति से बढ़ते जीवन के बीच यह श्रेणी और भी लोकप्रिय हुई है। हालांकि short film बनाने की चुनौती अलग किस्म की है। जिसमें कम समय में कहानी और कथ्य से दर्शक को कनेक्ट करना आसान भी नहीं है। लेकिन यदि किसी कहानी की आत्मा को सही से समझा जाए और निर्देशक उसको बेहद सलीके और खूबसूरती के साथ पर्दे पर उतार ले तो कोई भी फ़िल्म भाषा और देश की सीमाओं को लांघने में सफल हो सकती है। स्टूडियो UK13 की टीम द्वारा हमारी जनजातीय ‘भोटिया भाषा की लोक कथा’ में बनाई गई शार्ट फ़िल्म ‘पताल ती’ (Holy Water) का चयन ‘Short Film का मक्का’ कहे जाने वाले 39 वें Busan International Short Film Festival (Korea) में दुनियां के 111 देशों से आई 2548 फिल्मों में से world premier के लिए चुने जाने वाली 40 फिल्मों में से 14 वें स्थान पर चुना जाना हम सबको गौरवान्वित करता है। जिसके लिए स्टूडियो UK13 की टीम के प्रमुख सूत्रधार संतोष सिंह रावत की लगभग डेढ़ दशक के सब्र और जुनून को सलाम। बहुत सारे उतार-चढ़ाव और असफलताओं के बाद भी जितनी शिद्दत और एकाग्रता से संतोष और उसके साथी मुकुन्द नारायण ने इस काम अंजाम दिया वाकई में यह उनकी फिल्मों के प्रति दीवानगी को ही प्रदर्शित करता है। इस सब में एक खास बात यह भी रही कि संतोष ने ठेठ पहाड़ के घर-गांवों से उन युवाओं को एक टीम के रूप में जोड़ा जिनमें कुछ कर गुजरने का सपना भी था और जज़्बा भी लेकिन फिल्मी दुनियां से दूर-दूर तक कहीं कोई वास्ता न था। लेकिन एक टीम के रूप में नई पीढ़ी के इन युवाओं ने हमेशा अपना सर्वोत्तम देने की कोशिश की। इसका ही परिणाम है कि उनकी मेहनत रंग लाई और लगभग एक खामोश निःशब्द सी फ़िल्म ने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर अपनी एक अलग पहचान बनाई। फ़िल्म की कथा पहाड़ के ‘जीवन दर्शन’ को दर्शाती हुई अपने अंतिम समय पर दादा द्वारा पोते से कुछ ख्वाहिश रखना और पोते द्वारा उसे पूरा करने की कोशिश और प्रकृति के साथ सहजीवन और संघर्ष इसे और भी मानवीय और संवेदनशील बना देता है। यही वह खास बात है कि जो भाषा और देश की सीमाओं को तोड़कर हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है। पूरी फिल्म में कैमरे का कमाल, प्राकृतिक रोशनी, Landscape और कलाकारों की बिना संवाद के अदाकारी इसे अद्भुत बना देती है। फिल्में सिर्फ मनोरंजन भर के लिए नहीं होती बल्कि वो हमारी कला और संस्कृति को पोषित भी करती हैं और वाहक भी बनती हैं यह इस फिल्म से साफ झलकता है। उत्तराखण्ड जैसे प्राकृतिक सौंदर्य और लोककथाओं से भरपूर राज्य में अगर सही से एक फ़िल्म नीति और माहौल बनाया जाए तो रोजगार के लिए भी यह क्षेत्र सहायक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि न तो हमारे युवाओं में प्रतिभा की कमी है और न ही जुनून की अगर कुछ रह जाता है तो वह है सही मार्गदर्शन, नीतियां और प्रोत्साहन की कमी। यदि इस दिशा में सरकारें कुछ नया सोचें तो.......