Rudrashtak Ki Rahasymay Siddhi Sadhna रूद्राष्टक की रहस्यमय सिद्धि साधना
Shivkeshi Vishnath
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Rudrashtak Ki Rahasymay Siddhi Sadhna रूद्राष्टक की रहस्यमय सिद्धि साधना
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Rudrashtak Ki Rahasymay Siddhi Sadhna रूद्राष्टक की रहस्यमय सिद्धि साधना
महादेव की कृपा से मनुष्य के जीवन में अद्भुत परिवर्तन होते हैं ,
परन्तु महादेव यदि रूष्ट हो जायें तो मनुष्य के जीवन मे विपत्तियों का पहाड़ आ जाता है ।
तंत्र,मन्त्र साधना में गुरु का विशेष स्थान है यदि कोई मनुष्य गुरु रूप में किसी पवित्र जीवात्मा को स्वीकार करता है
जो कि देह में है और फिर उसका तिरस्कार करता है
तो निश्चय ही उसको महादेव के प्रकोप का सामना करना पड़ता है ।
इस लिए कभी गुरु अभेलना नही करनी चाहिए
यदि कोई मनुष्य गुरु रूप में है मगर दुष्ट और चरित्रहीन है तो उसे प्रणाम कर के उससे सदैव को दूर हो जायें।
उसे भी अभद्रता से न बोलें ,
क्योंकि वो कभी गुरु रहा है आपका परंतु महादेव उसे भी क्षमा नही करेंगे दंड जरूर देंगे क्योंकि गुरु पदवी पर बैठे व्यवचारी पातकी मनुष्य को महादेव के भैरव स्वरूप बहुत ही कठोर दंड देते हैं ।
गुरु शिष्य परम्परा में यह मर्यादा याद होना जरूरी है
एक दृष्टांत के अनुसार
जब कागभुशुण्ड जी अपने पूर्व जन्म में जो जीवन मे थे
उन्होंने शिव आराधना के समय आये हुए गुरु को प्रणाम नही किया था।
महादेव इतनी से गुरु निरादर से भी रूष्ट हो गए थे
जब कि उनकी मनसा ऐसी नही थी
वो महादेव आराधना में लीन थे सोचा साधना से उठ कर ही गुरु को प्रणाम करेंगे
और फिर उन्हें महादेव की रुष्टता का सामना करना पड़ा
तब उनके गुरु ने महादेव के समक्ष दण्डवत हो रुद्राष्टक से महादेव की आराधना की और उनके लिए क्षमा मांगी
गुरु का ह्रदय बड़ा ही कोमल होता है ।
परन्तु गुरु सदैव बाहर से कठोर ही रहता है शिष्य के लिए
मगर जब कोई शिष्य गुरु के ह्रदय के अंतः करण में देखने की दृष्टि पा लेता है तो ही वो गुरु की कोमलता को समझ सकता है ।
गुरु न मिलना उतना दुख कारक नही जितना गुरु बना के तिरस्कार करने से दुख का उदय होता है ।
इस लिए सदैव गुरु रूप का आदर करें गुरु को सम्मान नही दे सकते तो उसका तिरस्कार भूल कर भी न करें ।
कागभुशुण्ड जी के गुरु ने रुद्राष्टक करते हुए महादेव से प्रार्थना की थी
और फिर इस रुद्राष्टक की रचना इस कलयुग में गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी ,
कोई भी अबोध बुद्धि मनुष्य यदि ये सोच रहा हो कि कैसे की होगी तो गोस्वामी तुलसीदास जी के विषय मे बताया जाता है
की पूर्व में उनका ही जन्म था बाल्मीकि जी के रूप में और तुलसीदास जी के पास अंतर्दृष्टि थी काल खंड में देखने की और उन संवादों को सुनने का ज्ञान भी
बताते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान जी की ही मदद से रामचरित मानस लिखा था
और फिर हनुमान चालीसा ।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥
निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥
न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥८॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥
॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥
आदेश जय महाकाल जय माँ भगवती
आंतरिक चेतना शिव शक्ति विशुद्ध अघोर मार्ग
विषनाथ अघोरी / भैरवी शिवकेशी
Website - www.shivkeshivishnath.com
Contact No.-9354745460
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