झूमर | जितेंद्र नाथ सिंह 'जीत', बनारस | दुर्गेश उपाध्याय
Music of Durgesh Official
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झूमर | जितेंद्र नाथ सिंह 'जीत', बनारस | दुर्गेश उपाध्याय
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झूमर ©® जितेंद्र नाथ सिंह 'जीत', बनारस
चटक चाँदनी उगल अँजोरिया रहल रसीली नाव रे,
दईया रे दईया छमक छमाछम बाजे पयलिया पांव रे।
पंक्तियों का भावार्थ
"चटक चाँदनी उगल अँजोरिया रहल रसीली नाव रे" का अर्थ है, तेज़ चांदनी (मूनलाइट) अपने प्रकाश को उगल रही है और एक आकर्षक, सुंदर बोट (नाव) उस प्रकाश में तैर रही है।
"दईया रे दईया छमक छमाछम बाजे पयलिया पांव रे" में नारी के पैरों में पायलिया की मधुर छमछमाहट का वर्णन है, जो उसकी चाल, सौंदर्य और जीवन की मस्ती को दर्शाती है।
सांस्कृतिक और काव्यगत विश्लेषण
इन पंक्तियों में चाँदनी और पायल की छमछमाहट का प्रयोग स्त्री सौंदर्य और जीवंतता के प्रतीक के रूप में हुआ है।
नाव, चाँदनी, पायल—ये सभी प्राकृतिक और सांस्कृतिक छवियाँ हैं, जो भारतीय स्त्री की चपलता, रोमांच और आनंद को प्रकट करती हैं।
"दईया रे दईया" जैसी भाव-ध्वनियाँ भावुकता और लोकगीतों की रसधारा को बल देती हैं, जिससे गीत की बात सरल जनता तक पहुँचती है।
झूमर एक भोजपुरी लोकगीत की विधा है, जिसमें ग्रामीण जीवन, पारिवारिक प्रसंग, प्रकृति तथा सामाजिक भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति होती है।
झूमर विधा का परिचय
झूमर गीत भोजपुर क्षेत्र के लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा हैं, जो आमतौर पर उत्सव, ऋतु-परिवर्तन, विवाह आदि अवसरों पर गाए जाते हैं।
इन गीतों में ग्रामीण जीवन, मेहनत, प्रेम, और रिश्तों की झलकियां मिलती हैं।
मुख्य विशेषताएं
ये गीत अक्सर समूह में गाए जाते हैं, जिसमें महिलाएं या पुरुष टोली बनाकर गीत गाते हैं और कभी-कभी नृत्य भी करते हैं।
झूमर गीत की भाषा सरल और भावपूर्ण होती है, और इनमें लोक जीवन के विविध रंग शामिल होते हैं।
उदाहरण
"मकईया वाला आटा ना खाइबो राजा" जैसे गीत झूमर विधा के लोकप्रिय उदाहरण हैं, जिनमें मौजूदा सामाजिक या घरेलू मुद्दों को लेकर हास्य और संवाद दिखाया जाता है।
ये गीत विवाह, होली, तथा अन्य त्योहारों में काफी प्रचलित हैं, जैसे "विवाह झूमर गीत" या "नई झुलनी के छईया बलम जी" आदि।
सांस्कृतिक महत्व
झूमर गीत भोजपुर क्षेत्र की सामाजिक एकता, भावनात्मक अभिव्यक्ति, और लोककलाओं को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इनके माध्यम से पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक गीत-संस्कृति का स्थानांतरण होता है।
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