KALYUG KA DANAV 2 | Hindi Rap | KRISHAN | LUCKE |
Krishan Tunes
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KALYUG KA DANAV 2 | Hindi Rap | KRISHAN | LUCKE |
1 319 просмотров · 1 месяц назад
Krishan Tunes
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KALYUG KA DANAV 2 | Hindi Rap | KRISHAN | LUCKE |
Singer-Krishan
Lyrics-Krishan
Compose-Krishan
राधे राधे! 🌸
स्वागत है आपका Krishan Tunes चैनल पर — जहाँ राधा-कृष्ण की भक्ति, प्रेम और संगीत का संगम है।
यह चैनल समर्पित है उन दिव्य भजनों को जो हृदय को शांति, मन को सुकून और आत्मा को भक्ति से भर देते हैं।
Lyrics-
मैं हूं वो धुआँ जो सांसों में उतर जाता है,
सच की हर किरण को धीरे-धीरे खा जाता है।
मैंने इंसान के दिल से विश्वास चुरा लिया,
झूठ को सिंहासन, सत्य को रास्ता बना दिया।
मैंने रिश्तों को सौदों में बदलते देखा,
हर चेहरे पर नकाब को पलते देखा।
दौलत के आगे झुकता ईमान देखा,
ज़िंदा जिस्मों में मरता इंसान देखा।
हर शहर में मैंने भ्रम के दीप जलाए,
अपनों को अपनों से ही दूर करवाए।
क्रोध को मुकुट पहनाया मैंने,
लोभ को राजा बनाया मैंने।
आ जा यदि तुझे लगता है समय तेरा है,
देख मेरी चाल, हर मोहरा मेरा है।
मन के युद्ध में मैं हर रोज़ जीतता हूँ,
इंसान के भीतर बैठकर उसे ही हराता हूँ।
देख मेरी बनाई हुई ये दुनिया,
जहाँ शोर बहुत है, मगर सत्य गुम है।
जहाँ आँखें खुली हैं, मगर दृष्टि बंद है,
जहाँ भीड़ तो है, पर कोई संबंध नहीं है।
हर हाथ में शक्ति, मगर विवेक नहीं,
हर शब्द में आग, मगर प्रेम कहीं नहीं।
मैंने ऐसा ज़हर हवाओं में घोला है,
कि भाई ने भाई का ही खून खोला है।
कहाँ है वो धर्म जिसकी बातें होती थीं?
कहाँ हैं वो प्रतिज्ञाएँ जो निभाई जाती थीं?
अब तो न्याय भी बिकता दिखाई देता है,
हर फैसला सिक्कों से लिखा दिखाई देता है।
मैंने मंदिर नहीं गिराए,
दिलों के दीप बुझाए हैं।
मैंने तलवार नहीं उठाई,
बस विचारों में ज़हर मिलाए हैं।
जब-जब इंसान अपने धर्म से मुड़ा,
तब-तब मेरा साम्राज्य और बड़ा।
मैंने किसी को मजबूर नहीं किया,
हर पाप इंसान ने खुद ही चुना।
तभी गूँजी आकाश में एक पुकार,
अंधकार से भी ऊँची थी उसकी हुंकार।
"समझ बैठा है तू कि अंत यही है?
हर रात के बाद सवेरा भी यहीं है।
जब अन्याय सीमा को पार करेगा,
धर्म फिर से शंखनाद करेगा।
एक नहीं, लाखों दीप जलेंगे,
सत्य के सैनिक फिर निकलेंगे।
न तलवार से, न क्रोध से युद्ध होगा,
ज्ञान से अज्ञान का अंत होगा।
जो स्वयं को पहचान लेगा,
वही इस युग को बदल देगा।
अधर्म चाहे पर्वत बन जाए,
धर्म की एक किरण काफी है।
झूठ चाहे वर्षों तक राज करे,
सत्य की एक सुबह काफी है।"
काल मुस्कुराया...
पर पहली बार उसकी आँखों में भय था।
क्योंकि उसे समझ आ गया—
संसार का अंत अंधकार से नहीं होता,
अंत होता है उस क्षण से...
जब एक मनुष्य
अपने भीतर के प्रकाश को पहचान लेता है।
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