हनुमान चेतना चालीसा | Hanuman Chetna Chalisa | सुनते ही दूर होंगे सारे कष्ट और भय | Suraj Pateniya
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हनुमान चेतना चालीसा | Hanuman Chetna Chalisa | सुनते ही दूर होंगे सारे कष्ट और भय | Suraj Pateniya
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जय श्री राम! जय हनुमान!
प्रस्तुत है एक अत्यंत शक्तिशाली और ऊर्जावान रचना - "हनुमान चेतना चालीसा" (Hanuman Chetna Chalisa)।
इसे सुनने मात्र से जीवन के सारे कष्ट, भय और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है तथा मन को असीम शांति व शक्ति मिलती है।
सुबह या शाम के समय इसे रोज़ाना सुनें।
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𝐋𝐘𝐑𝐈𝐂𝐒 (संपूर्ण चालीसा):
[ दोहा ]
ज्ञान सिंधु मथकर प्रगट, मारुत सुत बलधाम।
चित्त झरोखे बैठिए, पूर्ण करहु सब काम।।
अहम् निशा का अंत कर, ज्ञान भानु चमकाव।
भव सागर की धार से, पल में पार लगाव।।
[ चौपाई ]
जयति पवन ऊर्जा के स्वामी, घट घट व्यापक अंतर्यामी।
शून्य रूप से प्रगट शरीरा, महातेज धारी मति धीरा।।
कनक वर्ण आभा चमकीली, दिव्य वसन सोहे छबि नीली।
श्रवण कुंडल अलौकिक साजे, मस्तक तिलक तेज रस राजे।।
वज्र देह रक्षक शरणागत, काल दूत देखत भय भागत।
हाथ गदा सोहे अति भारी, दुष्ट दलन ईश्वरीय धारी।।
शिव अंश तुम अमित अनंता, अचल चेतना ज्ञान समंता।
केसरी नंदन पावनकारी, अंजनी उदर धरी अवतारी।।
विद्या की तुम अविरल धारा, बुद्धि विवेक बोध विस्तारा।
चतुर चपल प्रभु काज सँवारे, राम हृदय के तुम रखवारे।।
अनाहत नाद तुम्हारी बानी, वेद पुराण मर्म तुम जानी।
अलख रूप धरि सिय सुधि लाए, भीषण रूप धरि दुष्ट डराए।।
महाकाय धरि लंक डराई, असुर सेन सब मारि गिराई।
राम काज हित प्राण पणाया, सुर नर मुनि को मार्ग दिखाया।।
द्रोण शिखर ला प्रान बचाए, लक्ष्मण जी के कष्ट मिटाए।
रघुकुल नायक हर्ष अपारा, तुमको माना प्रान अधारा।।
युग युग से तुम अमर विहारी, भूमंडल के मंगलकारी।
शेष शारदा कीरति गावें, कोटि शीश चरनन में नावें।।
सुरपति ब्रह्मा सनक सनेही, ऋषिमुनि ध्यावें पावन देही।
काल धनेश दिक्पाल डराहीं, कवि ज्ञानी महिमा कहि नाहीं।।
ऋष्यमूक पर मिता कराई, सुग्रीवहिं गद्दी दिलवाई।
दशानन अनुज को नीति सिखाई, स्वर्ण पुरी की साख दिलाई।।
रवि को जानि अलौकिक मीठा, निगल गए तुम अद्भुत दीठा।
राम नाम की मुद्रिका पाई, लाँघि गए तुम सिंधु अघाई।।
कठिन राह जो जग में होई, तव सुमिरन सुलभ करे सोई।
राघव द्वारक तुम रखवारी, बिनु आज्ञा नहिं पैठ विचारी।।
शरण तुम्हारी सुख की खानी, रक्षक तुम रघुकुल के दानी।
भय का संशय मूल नशावै, जो जीव तुमको शीश नवावै।।
महावेग को तुम ही रोको, गर्जन से कंपित सब लोको।
तिमिर निशाचर पास न आवै, मारुत सुत जो हृदय बसावै।।
व्याधि मिटे संकट टल जावे, नाम तुम्हारा जो दोहरावे।
बंध मुक्त होवे वो प्रानी, सुमिरन करे जो अंतर्ज्ञानी।।
अवधेश भूप के काज सँवारे, दीन दुखी के कष्ट निवारे।
मन की इच्छा जो कोई धारे, तुम क्षण में भव पार उतारे।।
युग युगांतर कीरति छाई, कलयुग में तुम देव सहाई।
सज्जन जन के रक्षक स्वामी, खल दल नाशक अंतर्यामी।।
सकल सिद्धि निधियों के स्वामी, जानकी मात कृपा अनुगामी।
राघव भक्ति सुधा रस पीता, दास शिरोमणि पावन चीता।।
नाम जपें जो राघव मिल जावे, कोटि जन्म का पाप नशावे।
देह तजे तो परम पद पावे, हरि भक्तों में नाम कहावे।।
[ दोहा / समापन ]
मारुत नंदन कष्ट हर, मंगल तेज स्वरूप।
मानस मन्दिर वास कर, ज्ञान शिखर के भूप।।
जय जय श्री सीताराम, जय पवनपुत्र हनुमान।।
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𝐂𝐨𝐧𝐜𝐞𝐩𝐭 & 𝐋𝐲𝐫𝐢𝐜𝐬: Suraj Pateniya
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