शुकसप्तति तृतीय कथा : तीन चतुर बुनकर और अहंकारी राजा • प्रभावती की रक्षा | Shuka Saptati Widescreen
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शुकसप्तति तृतीय कथा : तीन चतुर बुनकर और अहंकारी राजा • प्रभावती की रक्षा | Shuka Saptati Widescreen
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शुकसप्तति (७० अमर कथाएं) — तृतीय कथा : तीन चतुर बुनकर और अहंकारी राजा यशोधर्म — अदृश्य वस्त्र और चाटुकारिता का भ्रम!
The Seventy Tales of the Wise Parrot (Shuka Saptati) — Chapter 03: The Three Clever Weavers and the Vain King Yashodharma.
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📖 कथा-सार (STORY SYNOPSIS):
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संस्कृत क्लासिक 'शुकसप्तति' की ७० अद्भुत और नीतिपूर्ण कथाओं की तृतीय अमर कथा!
चन्द्रावती में तृतीय संध्या ढलते ही, राजकुमार का भेजा हीरक-कंकण पहनकर प्रभावती उद्यान की ओर निकलने लगी। तभी स्वर्ण-पिंजरे के ज्ञानी शुक ने पूछा—"अवश्य जाओ, सुन्दरी, किन्तु क्या तुम्हारे पास उन तीन चतुर बुनकरों जैसी निर्भीक बुद्धि है, जिन्होंने अहंकारी राजा यशोधर्म के असम्भव हठ को न्याय में बदल दिया था?" कौतूहल में प्रभावती के पग वहीं ठहर गए।
काशी नगरी में राजा यशोधर्म का शासन था, जिसका मन अपनी झूठी प्रशंसा सुनने के लिए सदैव लालायित रहता था। अपनी भव्यता दर्शाने हेतु, राजा ने राज्य के तीन श्रेष्ठ बुनकरों—गुणकार, चित्रकार और ज्ञानकार को दरबार में बुलाया। उसने आज्ञा दी कि वे उसके लिए एक ऐसा दिव्य वस्त्र बुनें जो अनुपम हो। तीनों बुनकरों ने शांत भाव से कहा कि वे सूक्ष्म तारों से ऐसा अलौकिक वस्त्र तैयार करेंगे, जो केवल ज्ञानी और सदाचारी मनुष्यों को ही दिखाई देगा, जबकि मूर्खों और चाटुकारों को वह पूर्णतः अदृश्य रहेगा। राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें तीस दिनों का समय और विपुल स्वर्ण देने का वचन दिया, साथ ही विफलता पर दण्ड की चेतावनी भी दी। अपनी कार्यशाला में जाकर तीनों बुनकरों ने बिना सूत के विशाल करघे स्थापित किए और शून्य में अपनी काष्ठ-शलाकाएं चलाने लगे।
पन्द्रहवें दिन राजा के महामन्त्री कार्य की प्रगति देखने कार्यशाला पहुँचे। करघों पर केवल खाली वायु देखकर उनके पसीने छूट गए, क्योंकि यह सत्य स्वीकार करने पर वे पद के अयोग्य सिद्ध हो जाते। मुख्य बुनकर गुणकार ने शून्य में हाथ उठाकर स्वर्ण-कमलों की काल्पनिक बनावट दर्शाई, तो भयभीत मन्त्री ने भी विवश होकर उस अदृश्य वस्त्र की झूठी प्रशंसा कर दी। तीसवें दिन, बुनकर रिक्त स्वर्ण-पेटिकाएं लेकर राजसभा में पहुँचे। राजा यशोधर्म ने अपने वस्त्र उतारकर दर्पण के सम्मुख खड़े होकर देखा। अपने शरीर पर कुछ न पाकर भी, अयोग्य कहलाने के भय से राजा ने उस अदृश्य परिधान की कोमलता की झूठी प्रशंसा की। राजा का अनुसरण करते हुए समस्त मन्त्रियों और दरबारियों ने मस्तक झुकाकर करतल ध्वनि की, क्योंकि कोई भी अपनी दुर्बलता प्रकट करने का साहस न जुटा सका।
स्वयं को स्वर्गीय परिधान में सुसज्जित मानकर, राजा यशोधर्म केवल अंतर्वस्त्रों में ही गजराज पर सवार होकर नगर-भ्रमण के लिए निकले। राजमार्ग पर खड़े सहस्रों नागरिक अवाक होकर अपने राजा को देखने लगे, किन्तु दण्ड के भय से प्रत्येक व्यक्ति मौन रहा। तभी एक अबोध बालक ने अपने पिता के कंधे से उंगली उठाकर सरल हंसी में कह दिया—"पिताजी, देखो, राजा ने तो कोई वस्त्र ही नहीं पहना है।" उस निश्छल वाणी ने चाटुकारिता का भ्रम तोड़ दिया और जनसमूह में हास्य की लहर दौड़ गई। लज्जा से लाल होकर राजा ने तुरंत प्रासाद लौटकर बुनकरों को राजसभा में बुलाया। तब गुणकार ने विनीत भाव से कहा—"हे राजन, हमारा उद्देश्य यह दिखाना था कि चाटुकारों का झूठा मोह सिंहासन को अंधा कर देता है, जबकि केवल सत्य ही राज्य की रक्षा करता है।" राजा ने सत्य स्वीकार कर उन्हें विपुल स्वर्ण से पुरस्कृत किया।
कथा पूर्ण कर शुक ने पूछा—"हे प्रभावती, क्या झूठी प्रशंसा करके पतन की ओर ले जाने वाले चाटुकारों पर विश्वास उचित है, अथवा उस सत्य का दर्पण स्वीकार करना श्रेयस्कर है जो कुल-मर्यादा की रक्षा करता है?" उंगली के हीरक को निहारती प्रभावती का भ्रम विलीन हो गया। तभी देवालयों से प्रभाती की शंख-ध्वनि गूंजी, और प्रभावती राजकुमार की मुद्रिका शुक के समीप रखकर मर्यादा की रक्षा करते हुए अपने अंतःपुर लौट गई।
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🪷 सीख (MORAL):
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चाटुकारों की झूठी प्रशंसा सिंहासन को अंधा कर देती है — केवल सत्य ही राज्य, कुल और मर्यादा की रक्षा करता है। भय के कारण मौन रहना भी असत्य का साथ देना है; एक अबोध बालक की निश्छल वाणी सम्पूर्ण सभा के भ्रम से अधिक शक्तिशाली होती है।
Flattery blinds the throne; only truth protects the kingdom.
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⏱️ CHAPTER TIMESTAMPS:
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00:00 - प्रस्तावना : तृतीय संध्या, हीरक-कंकण और शुक का प्रश्न
00:56 - काशी के राजा यशोधर्म और तीन बुनकरों का दिव्य वस्त्र
01:52 - महामन्त्री का निरीक्षण और राजसभा में अदृश्य परिधान
02:49 - नगर-भ्रमण और अबोध बालक का सत्य
03:48 - शुक का प्रश्न, प्रभाती और प्रभावती की मर्यादा
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