खाने काबा के गिलाफ का रंग और गुंबदे खिज़रा का रंग बदलता रहा है इतिहास पर एक नज़र #mecca #madina
Bate- Mulaqate
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खाने काबा के गिलाफ का रंग और गुंबदे खिज़रा का रंग बदलता रहा है इतिहास पर एक नज़र #mecca #madina
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खाना काबा और गुंबदे खिज़रा (गुंबद-ए-खद्रा) इस्लामी इतिहास और संस्कृति में गहरा महत्व रखते हैं। इनके रंग और डिजाइन में समय के साथ बदलाव आए हैं। आइए इनके इतिहास पर एक नजर डालते हैं:
1. *खाना काबा का गिलाफ (किस्वा)*
खाना काबा को ढकने वाले गिलाफ को "किस्वा" कहा जाता है। यह गिलाफ काला रेशमी कपड़े से बना होता है, जिस पर सोने और चांदी के धागे से कुरआन की आयतें कढ़ाई की जाती हैं। हालांकि, इतिहास में इसका रंग और डिजाइन बदलता रहा है:
**प्रारंभिक काल**: इस्लाम से पहले, काबा को विभिन्न रंगों के कपड़े से ढका जाता था, जैसे लाल, हरा और सफेद। यह परंपरा अलग-अलग कबीलों और शासकों के अनुसार बदलती रही।
**इस्लाम के बाद**: पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के समय में काबा को सफेद कपड़े से ढका जाता था।
**अब्बासिद काल**: अब्बासिद खलीफाओं ने काले रंग के कपड़े का उपयोग शुरू किया, जो आज तक जारी है। काले रंग को सम्मान और गंभीरता का प्रतीक माना जाता है।
**आधुनिक काल**: आज किस्वा सऊदी अरब के शाही परिवार द्वारा प्रदान किया जाता है। इसे हर साल हज के दौरान बदला जाता है।
2. *गुंबदे खिज़रा (गुंबद-ए-खद्रा)*
गुंबदे खिज़रा, जिसे "गुंबद-ए-खद्रा" या "हरे गुंबद" के नाम से जाना जाता है, मदीना में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की कब्र के ऊपर स्थित है। इसका रंग भी समय के साथ बदलता रहा है:
**प्रारंभिक काल**: पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मृत्यु के बाद, उनकी कब्र पर कोई गुंबद नहीं था। बाद में, एक साधारण संरचना बनाई गई।
**उमय्यद और अब्बासिद काल**: इस दौरान गुंबद का निर्माण हुआ, लेकिन इसका रंग सफेद था।
**ऑटोमन काल**: 16वीं शताब्दी में ऑटोमन सुल्तान सुलेमान ने गुंबद को हरे रंग से पेंट करवाया, जो आज तक बना हुआ है। हरा रंग इस्लाम में शांति और समृद्धि का प्रतीक है।
**आधुनिक काल**: आज गुंबदे खिज़रा हरे रंग का है और इसे सोने के साथ सजाया गया है। यह मदीना की पहचान बन गया है।
निष्कर्ष
खाना काबा का गिलाफ और गुंबदे खिज़रा का रंग इस्लामी इतिहास और संस्कृति के विभिन्न चरणों को दर्शाता है। ये बदलाव न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों को भी दर्शाते हैं। आज ये दोनों इस्लामी दुनिया के सबसे पवित्र और प्रतिष्ठित प्रतीकों में से एक हैं।
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