15. नौकर की कमीज - विनोद कुमार शुक्ल | Naukar Ki Kameez- Vinod Kumar Shukla | Hindi Books
Arisudan
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15. नौकर की कमीज - विनोद कुमार शुक्ल | Naukar Ki Kameez- Vinod Kumar Shukla | Hindi Books
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Welcome to Kitaab Ghar – your podcast for exploring some of the finest Hindi books – any genre, both old and new. Our book today – “Naukar Ki Kameez”, written by Vinod Kumar Shukla.
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“धूप कमरे में आती है। सूर्य नहीं आता। बारिश के दिन लगातार तीन दिन की धूप की जरूरत थी। इससे ज्यादा दिन की धूप नहीं चाहता था” – ये पंक्ति है विनोद कुमार शुक्ल लिखित “नौकर की कमीज” किताब से। इसी एक पंक्ति में इस किताब का सार दिखाई दे जाता है। शीर्षक “नौकर की कमीज” प्रतीक है एक ढांचे का, एक सोच का कि ये कमीज ऐसी है कि जो इसमें अच्छी तरह फिट हो जाएगा, वो नौकर कहलाएगा। जैसे कमीज न होकर एक साँचा हो।
बहुत सहज सरल लहजे में लिखी ये किताब कहानी कहती है हमारे समाज में स्थापित अलग-अलग वर्गों की, जिसमें निचले दर्जे पर सबसे गरीब, जैसे इस कहानी में मँहगू, फिर निम्न-मध्यमवर्गीय संतू बाबू, जो स्वयं ये कहानी कहानी कह रहे हैं, फिर आते हैं “बड़े बाबू” और उनके भी ऊपर बड़े साहब, और डॉक्टर साहब जैसे लोग। संतू बाबू का जीवन घर से शुरू होकर दफ्तर और बीच में शहर की गलियों में बीतता है और जो वो देखते हैं, सुनते हैं उसी में उस समय के समाज का एक खाका खिंच जाता है। उपन्यास 1979 में लिखा गया है तो समाज भी कुछ उसी समय का है.
Episode air date: 7-Jun-2025
Speakers: Arisudan Y
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