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नेम जी की जान बनी भारी। #जैनस्तवन #जैनभजन #terapanthsongs ‪@Jayshree_Life‬

Jayshree's Life

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नेम जी की जान बनी भारी। #जैनस्तवन #जैनभजन #terapanthsongs ‪@Jayshree_Life‬

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नेम जी की जान बनी भारी, देखण को आए नर नारी। नेम जी की जान बनी भारी, देखण को आए नर नारी॥ असंख्या घोड़ा और हाथी, मनुष री गिनती नहीं आती। ऊंट पर ध्वजा जो फहराती, धमक से धरती थर्राती॥ समुद्र विजय जी का लाडला, नेम उनो को नाम। राजुल दे को आय परणवा, उग्रसेन घर ठाम। प्रसन्न भई नगरी मनहारी, देखण को आए नर नारी॥ कसूमबल बागा ति भारी, कान में कुंडल छवि न्यारी। किलंगी तुर्रा सुखकारी, माल गल मोतियन की डारी॥ काने कुंडल जिगमिगे, शीश मुकुट झलकार। कोटि भानु की करूँ उपमा, शोभा अपरम्पार। बाज रह्या बाजा टकसारी, देखण को आए नर नारी॥ छूट रही उनकी शहनाई, ब्याह में आए बड़े भाई। झरोखे राजुल दे आई, जान को देखी सुख पाई॥ उग्रसेन जी देख के, मन में करे विचार। बहुत जीव करिये एक ठाँ, बाड़ों भर्यो अपार। करी सब भोजन की तैयारी, देखण को आए नर नारी॥ नेम जी तोरण पर आए, जीव पशु सब ही कुरलाए। नेम जी वचन जो फरमाए, जीव पशु काहे को लाए॥ याको भोजन होवसी, जान वास्ते। एह वचन सुनी नेम जी, थर-थर कांपे देह। भाव से चढ़ गए गिरनारी, देखण को आए नर नारी॥ पीछे सू राजुल दे आई, हाथ जब पकड़्यो है माई। कहां तू जावे मेरी जाई, और वर हेरूँ तुझ ताई॥ मेरे तो वर एक ही, हो गया नेम कुमार। और भुवन में वर नहीं, कोटि जो करो विचार। दीक्षा दिल राजुल ने धारी, देखण को आए नर नारी॥ सहेलियाँ सब ही समझावे, हिए राजुल के नहीं आवे। जगत सब झूठो दर्शावे, मेरे मन नेम कुमर भावे॥ तोड़ा कंकण डोरड़ा, छोड़्या नवसर हार। काजल टीकी पान सुपारी, त्याग्यो सब श्रृंगार। सहेलियाँ सब ही बिलखाणी, देखण को आए नर नारी॥ तज्या सब सोहळ श्रृंगारा, आभूषण रत्न जड़ित सारा। लगे मोय सब ही सुख खारा, छोड़कर चाली निर्धारा॥ मात-पिता परिवार को, तजतन लागी वार। कर वियोग चली आप सूँ, जाय चढ़ी गिरनार। झूरती छोड़ी माँ प्यारी, देखण को आए नर नारी॥ दया दिल पशुवन की आई, त्याग जब कीनो क्षण माही। नेम जिन गिरनारे जाई, पशुन के बंधन छुड़वाई॥ नेम-राजुल गिरनार पे, ध्यायो निर्मल ध्यान। नवल राम करि लावणी, उपन्यो केवल ज्ञान। मुक्ति का हुआ जो अधिकारी, देखण को आए नर नारी॥ नेम जी की जान बनी भारी, देखण को आए नर नारी। नेम जी की जान बनी भारी, देखण को आए नर नारी॥ असंख्या घोड़ा और हाथी, मनुष री गिनती नहीं आती। ऊंट पर ध्वजा जो फहराती, धमक से धरती थर्राती॥