डॉ सुशील से सहज सागर | अंतर्मना | Dr. Sushil Se Sahaj Sagar | Antarmana | जीवनकथा | Documentary
Jinendra Archana
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डॉ सुशील से सहज सागर | अंतर्मना | Dr. Sushil Se Sahaj Sagar | Antarmana | जीवनकथा | Documentary
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Jinendra Archana
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यह कहानी है सेवा, समर्पण और आध्यात्मिक उत्थान की... एक ऐसे व्यक्तित्व की, जिन्होंने अपने जीवन को मानवता और मोक्षमार्ग के लिए समर्पित कर दिया... यह कहानी है डॉ. सुशील जैन से , मुनि सहज सागर बनने तक के प्रेरणादायक सफर की।
5 अगस्त 1951 को , उत्तर प्रदेश के मैनपुरी नगर में, श्रीमती मनोरमा देवी की कोख से , एक बालक ने जन्म लिया। परिवार में सबने उन्हें प्यार से 'मुन्नू' कहकर बुलाया। सावन का महीना था, हरियाली तीज का उत्सव, और घर में चारों ओर खुशियाँ बिखरी हुई थीं।
मुन्नू धीरे-धीरे ,बड़े होने लगे। उन्होंने घर के कामों में , हाथ बँटाना शुरू किया। शिक्षा की नींव , घर से ही रखी गई। उन दिनों लाइट की सुविधा नहीं थी, इसलिए लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती थी।
एक दिन , उनकी माँ ने उन्हें पढ़ाई करते हुए देखा , और कहा, "मुन्नू बेटा, पढ़ाई में मन लगाओ, तुम्हें बड़ा आदमी बनना है।"
मुन्नू मुस्कराते हुए बोले, "माँ, मैं सिर्फ बड़ा आदमी नहीं, अच्छा आदमी भी बनूँगा।"
साल 1964 में, उन्होंने दसवीं कक्षा , अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की।
परिवार में 1928 से , निरंतर सेवा कर रहे 'जैन क्लिनिक' की जिम्मेदारी भी, उन पर थी। 1970 में उन्होंने , लखनऊ के , आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में , प्रवेश लिया , और 1976 से क्लिनिक पर , बैठना प्रारंभ किया। उनकी प्रसिद्धि , बढ़ती गई , और उन्होंने , चिकित्सकों को संगठित कर , नीमा एसोसिएशन की, स्थापना की। समाज की सेवा के लिए , सन्मति मेडिकल ट्रस्ट का भी गठन किया।
एक दिन एक बुजुर्ग मरीज क्लिनिक पर आए। उनकी आँखों में आँसू थे। और वो बोले
"डॉक्टर साहब, आपने मेरी जान बचाई। मैं अब बिना दर्द के जी सकता हूँ। भगवान आपको लंबी उम्र दे।"
डॉ. सुशील जैन ने विनम्रता से कहा, "सेवा ही मेरा धर्म है, बाबा। जब तक जीवन है, मैं यह करता रहूँगा।"
डॉ. सुशील जैन , इस में चिकित्सा क्षेत्र के साथ साथ , धर्म के हर क्षेत्र में भी , बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे
डॉक्टर सुशील जैन ने, देश विदेश में , प्रवचनों के माध्यम से , धर्म का प्रचार प्रसार किया, जैन धर्म के शीर्षस्थ विद्वानो में , आपकी गिनती होती थी ।
डॉक्टर सुशील जैन ने, जीवन में , बहुत से लोगो को , तीर्थ यात्राएँ करायी ।
सन 1983 में , उन्होंने इसरी में , आचार्य विद्यासागर जी के , प्रथम दर्शन किए। 1984 में , सिद्ध चक्र महामंडल विधान का , आयोजन किया , और 1987 में, श्रमण भारती की दशाब्दी समारोह का , भव्य आयोजन हुआ।
2020 में , जब पूरी दुनिया , कोरोना महामारी से जूझ रही थी, तब उन्हें भी , इस कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। उनके फेफड़े 96% संक्रमित हो चुके थे। 15 दिन तक , गाजियाबाद अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान , डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था।
डॉक्टरों ने उनके परिवार से कहा, "अब उम्मीद बहुत कम है। हमें नहीं लगता कि वे बच पाएँगे।"
लेकिन अंतर्मना गुरुदेव , और उपाध्याय श्री की कृपा से , वे जीवन की इस कठिन परीक्षा से , विजयी होकर लौटे।
सिंह निष्कृदित व्रत की , महा साधना करते हुए , अंतर्मना गुरुदेव ने डॉक्टर सुशील से कहा, कि कोविड से निकल आए तो , अब क्या सोचना ,लेट कर के जाना है ,या फिर बैठ कर । बस तभी , गुरदेव ने इक पर्ची दी , और बस उस पर्ची ने , सारा भाग्य बदल दिया ।
आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ते हुए,
जब दीक्षा ग्रहण करने का समय आया, तो उनके परिवार के लोग भावुक हो गए।
एक पारिवारिक सदस्य ने कहा, "क्या आप हमें भूल जाएँगे ?
डॉ सुशील ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, "संन्यास त्याग है, मोह नहीं। मेरा प्रेम सदा तुम सबके लिए रहेगा, लेकिन अब मेरा जीवन सत्य की खोज में समर्पित है।"
और फिर उन्होंने 1 फरवरी 2023 को, सम्मेद शिखर जी में , अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के कर कमलों द्वारा क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की।
यह उनकी , आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत थी।
साल 2023 के अंत में, आध्यात्मिक मार्ग पर , एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए, उन्होंने 28 दिसंबर 2023 को, कुंजवन, उदगांव, महाराष्ट्र में , मुनि दीक्षा ग्रहण की। उनके दीक्षा गुरु पुनः , आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ही रहे। यह उनका पूर्ण रूप से , त्यागमयी जीवन का प्रारंभ था।
दीक्षा के बाद , सबसे पहले उन्होंने , गोमटेश्वर बाहुबली जी की, यात्रा की और फिर , अपना पहला चातुर्मास , कुलचारम, तेलंगाना में किया।
इसके बाद मुनिश्री ने कई स्थानों की यात्रा की, जहाँ मुनिश्री , धर्म प्रचार एवं साधना में लीन रहे। उन्होंने अनेक लोगो के जीवन में , नियम व्रत देकर संस्कारों का वृक्षारोपण किया, जिससे समाज में , धार्मिक चेतना जाग्रत हुई।
एक चिकित्सक से लेकर , एक तपस्वी मुनि सहज सागर, बनने तक की यह यात्रा , समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनकी यह यात्रा हमें बताती है , कि , सच्ची सेवा, त्याग और भक्ति से जीवन में , सर्वोच्च शिखर को प्राप्त किया जा सकता है।
आइए, हम इस महान यात्रा से , प्रेरणा लें , और अपने जीवन को भी , धर्म, सेवा और साधना की ओर अग्रसर करें।
जय जिनेंद्र!
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