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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 23 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti

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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 23 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

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Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 23 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |    • माण्डूक्यकारिका - अद्वैत  प्रकरण - 23 | पर...   परम पूज्य महाराजश्री 'माण्डूक्यकारिका' के अद्वैत प्रकरण पर चर्चा कर रहे हैं। प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: मुख्य बिंदु : 1 . माया की व्याख्या (0:44 - 16:00): परम पूज्य महाराजश्री ने माया को समझने के लिए रस्सी में सांप और आकाश की नीलिमा का उदाहरण दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैसे रस्सी के वास्तविक स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, वैसे ही अधिष्ठान (परमात्मा) में सृष्टि का आभास मात्र होता है, वास्तव में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। 2 . पौराणिक कथाओं के माध्यम से बोध (8:00 - 19:50): विष्णु पुराण से 'निदाग और रिभु' ऋषि के संवाद और श्रीमद् भागवत से 'मार्कण्डेय जी' के वृत्तांत के द्वारा माया की निवृत्ति और ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को समझाया गया है। 3 . सृष्टि और अजातवाद (26:00 - 33:00): 'अजायमान' पद की व्याख्या करते हुए परम पूज्य महाराजश्री बताते हैं कि परमात्मा न कभी पैदा हुआ है और न होगा। वेदों में सृष्टि संबंधी जो मंत्र हैं, वे अद्वैत तत्व की ओर संकेत करने के लिए हैं, न कि सृष्टि को सत्य सिद्ध करने के लिए। 4 . सुषुप्ति और स्मृति का प्रश्न (28:45 - 31:40): सुप्त अवस्था की स्मृति कैसे होती है, इस पर परम पूज्य महाराजश्री ने स्पष्ट किया कि यह सब अंतःकरण की कल्पित त्रिपुटी है। जैसे स्वप्न में समय और घटनाओं का अनुभव मिथ्या होता है, वैसे ही यह संसार भी प्रतिभास मात्र है। 5 . उदार दृष्टि और एकत्व (39:35 - 45:00): परम पूज्य महाराजश्री ने स्व-पर के भेद को समाप्त करने की बात कही है। वे बताते हैं कि पारिवारिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक घेरों से ऊपर उठकर ईश्वर के व्यापक स्वरूप को देखना ही मानवता और शांति का आधार है। #swamiakhandanandsaraswati #mandukyaadvaitprakaran #anandprastuti #satsang #anandvrindavanashram