महाप्रस्थान: जब स्वर्ग की चाह में पीछे छूट गई करुणा | नरेश मेहता
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महाप्रस्थान: जब स्वर्ग की चाह में पीछे छूट गई करुणा | नरेश मेहता
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क्या मनुष्य सब कुछ पाने के बाद भी भीतर से खाली रह सकता है?
नरेश मेहता का ‘महाप्रस्थान’ केवल महाभारत के पांडवों की अंतिम यात्रा की कथा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाली उस यात्रा का भी रूपक है, जिसमें सत्ता, विजय, सफलता, प्रतिस्पर्धा, विकास और उपलब्धियों के पीछे भागता हुआ मनुष्य बहुत कुछ हासिल करता है—लेकिन कई बार अपनी करुणा, संवेदना, संबंध और आत्मशांति खो देता है।
इस समीक्षा में हम ‘महाप्रस्थान’ को केवल पौराणिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के आईने के रूप में समझने का प्रयास करेंगे।
द्रौपदी का हिमालय की यात्रा में पीछे छूट जाना क्या केवल एक घटना है?
युधिष्ठिर का धर्म और नैतिकता के प्रति आग्रह क्या वास्तव में मानवीय संवेदना से बड़ा हो सकता है?
अर्जुन की विजय और विस्तार की आकांक्षा हमें आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया की याद क्यों दिलाती है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या हम भी आज सफलता, पद, प्रतिष्ठा, धन और विकास की दौड़ में बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खो नहीं रहे हैं?
शायद ‘महाप्रस्थान’ की सबसे बड़ी यात्रा हिमालय की ओर नहीं, मनुष्य के अपने अंतर्मन की ओर है।
वीडियो पूरा देखिए और बताइए—
आपके लिए सच्ची सफलता क्या है?
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