जिस पर भरोसा था, वही अदालत में खामोश
पंख रंगमंच
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जिस पर भरोसा था, वही अदालत में खामोश
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नानझोउ के एक कभी-धनी घराने की इकलौती बेटी जियांग निंग। बीसवें जन्मदिन की रात एक अनहोनी हुई; आत्मरक्षा में हुई त्रासदी के बाद अदालत ने उसे तीन साल छह महीने की सजा दी। जिसे वह मन ही मन चाहती थी—झान बेइये—गवाही दे सकता था, पर अदालत में उसकी आवाज़ नहीं उठी। जेल में रहते हुए दादा चले गए। बाहर निकली तो सॉन्ग नानी उसे झान परिवार में ले आईं। मगर घर के भीतर फुसफुसाहटें, बाहर समाज की उँगलियाँ, और हे परिवार के सख्त सवाल—सब मिलकर उसे फिर से तोड़ने को तैयार हैं। जियांग निंग तय करती है: अब वह सफाइयों में नहीं जीएगी; अपना रास्ता खुद बनाएगी। क्या वह उस घर में अपनी जगह बना पाएगी? झान बेइये की खामोशी धोखा थी, या किसी छिपे सच की रक्षा? जन्मदिन की रात का असली सिलसिला क्या था, और कौन किसे ‘अपना’ बनाकर रखना चाहता है? जब अतीत वापसी की दस्तक दे, तो क्या नया जीवन सच में शुरू हो पाता है?