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श्रीकृष्ण गीता अमृतम् 🦚 | Bhagavad Gita Shlok | Krishna Bhajan | गीता के दिव्य श्लोक | Hare Krishna

V Y O M • M A N T R A

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श्रीकृष्ण गीता अमृतम् 🦚 | Bhagavad Gita Shlok | Krishna Bhajan | गीता के दिव्य श्लोक | Hare Krishna

77 просмотров · 9 дней назад
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🦚 ॥ श्रीकृष्ण गीता अमृतम् ॥ 🦚 श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य श्लोकों और श्रीकृष्ण की अमृतवाणी से प्रेरित यह भक्तिमय प्रस्तुति जीवन, कर्म, आत्मा, भक्ति, धर्म और ईश्वर की शरण का संदेश देती है। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वही आज भी हमारे जीवन को सही दिशा दिखाता है। ✨ इस प्रस्तुति में भगवद्गीता के प्रमुख श्लोक: • अध्याय 2 — श्लोक 11: आत्मा और शोक का ज्ञान • अध्याय 2 — श्लोक 20: आत्मा की अमरता • अध्याय 2 — श्लोक 47: कर्मयोग • अध्याय 4 — श्लोक 7-8: धर्म की स्थापना • अध्याय 9 — श्लोक 26: प्रेम और भक्ति • अध्याय 10 — श्लोक 8: श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा • अध्याय 12 — श्लोक 13: भक्ति और करुणा • अध्याय 16 — श्लोक 21: काम, क्रोध और लोभ • अध्याय 18 — श्लोक 66: श्रीकृष्ण की शरणागति अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ "हे अर्जुन! तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और बातें ज्ञानियों जैसी कर रहे हो। परंतु जो वास्तविक ज्ञानी (पंडित) होते हैं, वे न तो जीवित व्यक्तियों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतकों के लिए।" न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ यह आत्मा किसी काल में न तो जन्म लेती है और न ही कभी मरती है; और न ही ऐसा है कि यह पहले न होकर फिर अस्तित्व में आई हो या आगे होने वाली हो। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी इसका विनाश नहीं होता। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ तुम्हारा केवल कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल की इच्छा रखने वाले मत बनो, और न ही तुम्हारी आसक्ति कर्म न करने (अकर्म) में हो। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात प्रकट होता हूँ (अवतार लेता हूँ)। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ सज्जन पुरुषों के कल्याण और रक्षा के लिए, दुष्ट कर्म करने वालों के पूर्ण विनाश के लिए, तथा धर्म की भली-भांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ (अवतार लेता हूँ)। पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, फूल, फल या केवल जल भी अर्पित करता है, उस शुद्ध अंतःकरण वाले निष्काम भक्त द्वारा प्रेमपूर्वक भेंट की गई उस वस्तु को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ (ग्रहण करता हूँ)। अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ मैं ही संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ गतिशील (प्रवृत्त) होता है। इस बात को तत्व से जानकर ज्ञानीजन पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से युक्त होकर मेरा भजन करते हैं। अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, सबके प्रति मित्रभाव और करुणा रखने वाला है, ममता (आसक्ति) और अहंकार से सर्वथा मुक्त है, सुख और दुःख में सम रहने वाला है तथा क्षमाशील है (वही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है)। त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ काम (वासना), क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकार के द्वार आत्मा का नाश करने वाले (पतन की ओर ले जाने वाले) तथा नरक की प्राप्ति कराने वाले हैं। इसलिए इन तीनों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ संपूर्ण धर्मों के आश्रय (सभी सांसारिक विधियों, कर्मकांडों और कर्तव्यों की आसक्ति) को छोड़कर केवल एक मेरी ही शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों और बंधनों से मुक्त कर दूंगा, तुम शोक मत करो। 🦚 जय श्रीकृष्ण | जय श्रीमद्भगवद्गीता | जय योगेश्वर 🦚 अगर यह गीता अमृत आपको पसंद आए तो: ❤️ Like करें 🔔 Channel को Subscribe करें 📤 अपने प्रियजनों के साथ Share करें 💬 Comment में लिखें — "जय श्रीकृष्ण" 🙏 #श्रीकृष्ण #भगवद्गीता #Krishna #BhagavadGita #KrishnaBhajan #Gita #HareKrishna #KrishnaMantra #गीता #कृष्णभजन #सनातनधर्म #DevotionalSongs #KrishnaSongs #GitaShlok #Janmashtami